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भरत ने भ्रातृ प्रेम की दी अनूठी शिक्षा

Jalaun

Updated Sat, 20 Oct 2012 12:00 PM IST
उरई (जालौन)। गल्ला व्यापारी संघ द्वारा आयोजित रामलीला के छठवें दिन गुरुवार की रात केवट राम संवाद, दशरथ प्राण त्याग तथा चित्रकूट में भरत मिलाप की लीला का मंचन किया गया।
भगवान राम, लक्ष्मण व सीता वनगमन के समय सरयूतट पर पहुंचे तो उन्होंने अपने साथ आए मंत्री सुमंत को वापस भेज दिया। नदी पार करने के लिए केवट को बुलाया, लेकिन केवट ने राम को नाव में बैठाने से मना कर दिया। तब भगवान राम ने केवट से कारण पूछा तो उसने कहा कि प्रभु आपके चरणों की धूल छूने से जब एक शिला नारी बन गई तो मेरी नाव तो लकड़ी की है। यही मेरी रोजी है। जब तक आप पैर न धुलवा लेंगे तब तक नाव में नहीं बैठाऊंगा। भगवान ने केवट की बात मानकर पैर धुलवाएं। जब नदी पार कर भगवान राम केवट को सीता द्वारा दी गई अंगूठी उतराई में देने लगे तो केवट बोला प्रभु जैसे मैंने आपको नदी के पार किया है वैसे ही आप हमें भव सागर के पार कर देना।
उधर, जब सुमंत बिना राम, लक्ष्मण और सीता के वापस राजा दशरथ के पास पहुंचे तो वह अपनी सुधबुध खो बैठे और उन्हें श्रवण कुमार की कथा याद आने लगी। उन्हें श्रवण कुमार के अंधे माता पिता का जाप याद आने लगा कि एक दिन पुत्र के वियोग में उसे भी अपने प्राण छोड़ने पडे़ंगे। इसी दौरान राजा दशरथ राम राम कहकर अपने प्राणों का त्याग कर देते हैं। जब भरत व शत्रुघ्न को पता चलता है कि मां कैकेयी द्वारा उनके भाई राम को 14 वर्ष वनवास व उन्हें राज्य का वरदान मांगा है तो भरत कैकेयी को काफी भला बुरा कहा और राज्य का त्याग करके अपने बडे़ भाई से मिलने चित्रकूट पहुंचे।
जब राम ने भरत की दीनदशा देखी तो बहुत समझाया और अयोध्या का राज्य करने के लिए कहा लेकिन भरत ने राज्य करने से इंकार कर दिया। भगवान राम ने भरत से कहा कि रघुकुल की रीति है कि प्राण देकर भी अपने वचन और धर्म का पालन करते हैं। इसी आन को लेकर पिता जी ने अपने प्राण त्याग दिए। अब हमारा धर्म है कि हम दोनों भाई अपने पिता के द्वारा दिए गए वचनों का पालन करें। तब भरत ने कहा कि आप अपनी खड़ाऊं दे दें। जिन्हें राज्य सिंहासन पर रखकर में राज्य संचालन करूंगा। लीला की व्यवस्था में रामलीला संयोज राजकुमार तिवारी, संजय रावत अपने सहयोगियों के साथ व्यस्त रहे।
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