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बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचान है लोक क्रीड़ा पर्व ‘सुआटा’

Jalaun

Updated Tue, 09 Oct 2012 12:00 PM IST
कोंच (जालौन)। बुंदेलखंड में लोकगीत, लोकपर्व और लोकपरंपरायें गहरे तक रची बसी हैं। ऐसा ही एक लोक क्रीड़ा पर्व है सुआटा जिसे बुंदेली बालाएं बड़े ही चाव से खेलती हैं और उनके बड़े बूढे़ उनका उत्साह बढ़ाते हैं। इस पर्व को विभिन्न चरणों में पूरे क्वांर मास में खेला जाता है। सुआटा के इस खास बुंदेली आंचलिक पर्व में यहां की समृद्घ लोककला की झलक साफ दिखाई देती है।
सुआटा नामक इस लोक क्रीड़ा पर्व का प्रादुर्भाव कब और कैसे हुआ इसके कोई अभिलेखीय पुष्ट और प्रामाणिक साक्ष्य भले ही न मिलते हों लेकिन पूरी आस्था और विश्वास के साथ यहां की बुंदेली बालायें इस पारंपरिक खेल को प्रति वर्ष खेलती आ रही हैं। इस खेल को नौरता भी कहा जाता है। इसके पांच चरण होते हैं और हर चरण की एक खास अवधि होती है, इसके अलावा हर चरण के अलग अलग लोकगीत होते हैं जिन्हें सुन कर सभी का मन आह्लादित हो उठता है। इस अनूठे क्रीड़ोत्सव की शुरुआत मामुलिया से होती है, छोटी छोटी बालिकायें कांटोंदार टहनियों में रंग बिरंगे फूलों से मामुलिया सजाती हैं और मामुलिया के गीत गाती हुई जब गांव गिरांव की गलियों से गुजरती हैं तो बरबस ही यह आभास होने लगता है कि सुआटा पर्व अब धीरे धीरे परवान चढ़ने लगा है।
मामुलिया के चरण में बालक बालिकायें पूर्वाभिमुखी दीवार पर भित्ति आलेखन गोबर से करती हैं और आयत में थपियां लगाई जाती हैं, इसके बाद मामुलिया सजा कर ‘मामुलिया के आये लिवौआ, झमक चली मेरी मामुलिया’ गीत गाती हुई उसे किसी नदी, पोखर या तालाब में विसर्जित कर देती हैं। प्रतिदिन आयत के अंदर एक और आयत की वृद्धि होती जाती है और भित्ति आलेख में नदी, सूर्य, चंद्रमा, पहाड़ आदि के दृश्य बड़े ही सुघड़ तरीके से अंकित किये जाते हैं। यह पहला चरण एक पखवाड़े तक चलने के बाद गोबर निर्मित आकृतियां दीवार से उतार कर पानी में विसर्जित कर दी जाती हैं।
इस लोकक्रीड़ा पर्व का दूसरा चरण नवरात्र भर खेला जाता है जिसमें उसी दीवार पर मिट्टी से राक्षस की आकृति बनाई जाती है और उसमें रंग बिरंगे कंचों व कौड़ियों को मणि-माणिक्यों की भांति अलंकृत किया जाता है। तत्पश्चात् मिट्टी की गौरी प्रतिमा बना कर उसका दुग्ध स्नान कराया जाता है और बालिकायें एक दूसरे की कांय उतारते वक्त गाती हैं- ‘हिमांचल जू की कुंअरि लड़ायती नारे सुआटा, गौरा बाई नेरातौ बंधाइयो नारे सुआटा’।
सुआटा का तीसरा और चौथा चरण साथ साथ खेले जाते हैं जिसमें बालक टेसू खेलते हैं और बालिकायें झिंझिया। गीत गाकर बालक घर घर टेसू मांगते हैं और गृहस्वामिनियां उन्हें पैसा या अनाज देकर संतुष्ट करती हैं। इसी तरह ‘बूझत बूझत आये हैं नारे सुआटा’ जैसे गीत गाकर बालिकायें झिंझिया मांगती हैं और उन्हें भी इसी तरह के पारितोषिक प्राप्त हो जाते हैं। इस पारितोषिक का उपयोग नौरता के पांचवें और अंतिम चरण टेसू झिंझिया के विवाह में किया जाता है। क्वांर माह की पूर्णिमा जिसे शरद पूर्णिमा भी कहते हैं, क ो रात्रि में टेसू-झिंझिया परिणोत्सव धूम धाम से सम्पन्न होता है। बालक दीवार पर उत्कीर्ण सुआटा नामक राक्षस को लूट ले जाते हैं, उत्सव की समाप्ति पर खीलें गट्टे बांटे जाते हैं। इस प्रकार एक माह तक चलने बाले लोकक्रीडा पर्व का समापन हो जाता है।
यह लोकक्रीड़ा पर्व बुंदेलखंड की सांस्कृतिक धरोहर में शुमार है जिसे उत्तर प्रदेश के संस्कृति विभाग ने संरक्षित करने का भी प्रयास किया है। यहां के जाने माने लोक कला विशेषज्ञ अयोध्याप्रसाद गुप्त ‘कुमुद’ ने भी इस अनूठे विषय पर गहराई से शोध करके इसे बुंदेलखंड की एक अप्रतिम और प्रमुख सांस्कृतिक पहचान बताया है।
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