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अबकी घाटे का सौदा रहा मेला श्रीदाऊजी महाराज

Hathras

Updated Tue, 09 Oct 2012 12:00 PM IST
स्लग-
ठेकेदार को हुआ 10 लाख का घाटा, खेल-तमाशे वालों ने उखाड़े तंबू
हेडिंग-
हाथरस। लक्खी मेला श्री दाऊजी महाराज का सोमवार को समापन हो गया। मेला इस बार पूरी तरह फीका रहा। एक-दो कार्यक्रम को छोड़कर कोई कार्यक्रम स्तरीय नहीं हुआ। मेले में इस समय अपेक्षित भीड़ भी नहीं उमड़ी। स्थिति यह है कि मेले को लेकर दुकानदारों, खेल-तमाशे वालों को खासा दर्द है। ठेकेदार तक का यही कहना है कि इतना घाटा पहले कभी नहीं हुआ और मेले में इस बार कोई रौनक दिखाई नहीं दी।
मेले में चूंकि भीड़ नहीं आ रही, इसलिए समापन वाले दिन ही कुछ खेल-तमाशे और झूले वालों ने अपने सामान समेटने शुरू कर दिए हैं। उन्हें उम्मीद न थी कि बृज क्षेत्र का यह लक्खी मेला उनके लिए उस बार काफी घाटे का सौदा होगा। यहां यह तथ्य भी गौरतलब है कि प्रशासन भी मेले की व्यवस्थाओं को सही तरीके से क्रियान्वित नहीं कर पाया। पहले मेले की समापन तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति रही। बाद में तिथि बढ़ी तो तीन दिन तक रात्रि में कोई कार्यक्र म नहीं हुए। ऐसे में लोगों का मेले के प्रति रुझान काफी कम दिखाई दिया।
बृज क्षेत्र का मेला श्रीदाऊजी महाराज दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। पिछले 100 साल से मेले का आयोजन हो रहा है। मेले में अखिल भारतीय कुश्ती दंगल, संगीत निशा, पंजाबी दरबार, देसी तड़का, कवि सम्मेलन्र, ख्याल, कव्वाली, स्वांग, देवी जागरण जैसे रात्रिकालीन कार्यक्रम होते हैं। एक पखवाड़े तक यह स्थिति रहती है कि मेले के चलते शहर में पता ही नहीं चलता कि रात है या दिन। मेले में हर साल देश-विदेश के नामचीन कलाकार आते हैं और हजारों-लाखों की भीड़ मेले में जुटती है। इसके विपरीत इस बार ऐसा नहीं हुआ। मेले में कई कार्यक्रम हटा दिए गए। कुछ कार्यक्रमों को छोड़कर किसी कार्यक्रम में अपेक्षित भीड़ नहीं जुट सकी। वहीं दूसरी ओर मेले का ठेका पिछली साल की अपेक्षा साढ़े पांच लाख की ज्यादा धनराािश पर उठा। इस बार ठेका 44 लाख में उठा। महंगाई की मार के चलते दुकानदारों और खेल-तमाशे वालों ने भी मेले में धंधा करने के नाम पर कम रिस्क ही लिया और मेला क्षेत्र की काफी जगह खाली दिखाई दी।
मेले की अवधि को लेकर भी असमंजस की स्थिति रही। पहले मेले की अवधि 30 सितंबर तक की गई। इसका मुख्य कारण सीएम का दौरा बताया गया। बाद में जब ठेकेदार व अन्य लोगों ने इस पर कड़ा ऐतराज किया तो समापन की तिथि 8 अक्तूबर कर दी गई। इस बीच तीन दिन रात्रि के कार्यक्रम नहीं हुए। पूरा मेला ही फीका हो गया। सोमवार को हालात यह थे कि मेले का समापन शाम को था, लेकिन ज्यादातर झूले, खेल-तमाशे वाले अपने टैंट-तंबू उखाड़ने में लगे थे।
प्रशासन ने नहीं किया अपेक्षित सहयोग
ठेकेदार राजीव कुमार वार्ष्णेय का कहना है कि इस बार मेला काफी घाटे का सौदा साबित हुआ है। मेले के आयोजन में इस बार प्रशासन ने अपेक्षित सहयोग नहीं किया। पहले यह घोषणा कर दी कि 30 सितंबर तक ही मेला चलेगा। इससे लोगों के सामने भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। यही नहीं कुछ ऐसी मेला भूमि पर प्रशासन ने अपने शिविर लगा दिए, जो दो लाख में उठ जाती। कार्यक्रम भी ऐसे खास अच्छे नहीं हुए, जिनमें ज्यादा भीड़ आ पाती। मेले में 10 लाख का घाटा झेलना पड़ा है। पिछली बार इस मेले के ठेके में ढाई लाख का मुनाफा हो गया था।
भीड़ नहीं आई इस बार मेले में
मेले में आए सर्कस के प्रबंधक शमीम निवासी अमरोहा का कहना था कि वह और मेला ठेकेदार अपनी पार्टनरशिप में सर्कस लेकर आए थे। सर्कस सीतापुर का है। इस बार करीब सवा से डेढ़ लाख तक का घाटा है। उनका कहना है कि मेले में भीड़ न आने की वजह से तो धंधा मंदा रहा ही, लेकिन साथ ही मेला इस बार बरसात के मौसम से एक महीने बाद हुआ, इसकी वजह से भी मेले पर असर पड़ा। बरसात के मौसम में लोग खाली रहते हैं और मेले में आते हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। वह लगभग हर साल यहां सर्कस लगवाते हैं, लेकिन इतना फीका मेला पहले कभी नहीं लगा।
इस बार तो मूलधन भी नहीं निकल रहा।
मेले के महिला मार्केट में आर्टिफिशियल ज्वैलरी, चूड़ी, कंगन और अन्य आइटमों की दुकान लगाने वाले राजू निवासी इटावा का कहना था कि इस बार काफी महंगी दुकान मिली। उस पर छह फुट जगह है, जोकि 9 हजार में किराए पर मिली है। उसका भी कहना है कि इस बार मेले में कोई मुनाफा नहीं हुआ है। देहात की पब्लिक मेले में नहीं आई। सबसे ज्यादा वही खरीददारी करती है। पिछली बार भी वह मेले में आया था तो उसे खा-पीकर 10 हजार बच गए थे, लेकिन इस बार तो मूलधन भी नहीं निकल रहा। बचत की बात तो अलग है।
खिलौने खरीदने को नहीं आ रहा कोई
मेले में खिलौने बेचने वाले दुकानदार धीरी सिंह निवासी सोखना का कहना था कि उस पर पांच सौ रुपये रोज के हिसाब से दुकान है। पूरे दिन वह हाथ पर हाथ रखे बैठा रहता है। मेले में इस बार पब्लिक ही नहीं आ रही। जो लोग आ भी रहे हैं, वह खिलौने दूर से देखकर वापस चले जा रहे हैं। इस बार उसे करीब 10 हजार का घाटा है, जबकि पिछली बार उसे 8 हजार का फायदा हो गया था। इतना घाटा पहले कभी नहीं हुआ। उसका कहना है कि अब भरतपुर में मेला लगेगा और वह वहां जाकर अपनी स्टाल लगाएगा।
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