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एजेंसी और कंपनियों की रार में पिस रहे लोग

Hathras

Updated Sun, 17 Jun 2012 12:00 PM IST
हाथरस। गैस एजेंसियों और कंपनियों की खींचतान में जिले के आम उपभोक्ता पिस रहे हैं। गैस संकट पर होने वाली सरकारी बैठकाें में एजेंसी वाले या तो कंपनियों से डिमांड के हिसाब से सप्लाई न मिलने या फिर कामर्शियल की जगह घरेलू सिलेंडरों के धड़ल्ले से हो रहे इस्तेमाल का रोना रो देते हैं, जबकि कंपनियों का दावा है कि वह एजेंसियों को हर दिन की डिमांड के हिसाब से ही रीफिल दे रहे हैं, फिर भी किल्लत क्यों है, यह तो एजेंसी वाले ही जानें। एजेंसियाें और कंपनियों में से कौन सही है, यह तो वही बता सकते हैं, लेकिन उनकी मनमानी का खामियाजा शहर के निर्दोष उपभोक्ता भुगत रहे हैं। कुछ एजेंसियों से तो बुकिंग के एक से डेढ़ महीने बाद भी उपभोक्ताओं को रीफिल नहीं मिल पाती। रोजाना घंटों लाइन में लगने के बाद वह मायूस लौट जाते हैं। रसोई गैस संकट पर चर्चा के दौरान एजेंसी वाले ब्लैक मार्केटिंग का तो नाम भी नहीं आने देते। कोई भी एजेंसी वाला यह मानने को तैयार नहीं है कि उनके यहां ब्लैकियों का बोलवाला है, जबकि उपभोक्ता चीख-चीखकर इसकी शिकायत करते रहे हैं। कई बार ब्लैकियों को लेकर उनकी एजेंसियों पर हंगामा भी हुआ है, लेकिन ब्लैकियों का बाल भी बांका नहीं हुआ है। वह जब भी एजेंसियों के दफ्तरों या गोदामों पर पहुंचते हैं तो वहां सबसे पहले उन्हें पर्ची मिलती है और रीफिल भी पहले उन्हें ही दी जाती है। एक अनुमान के मुताबिक जिले में उपभोक्ताओं के हक की 20 से 30 फीसदी तक रीफिल ब्लैक मार्केटिंग में खप रही है। सीएनजी फ्यूल स्टेशन न होने के बावजूद जिले में धड़ल्ले से चल रहीं सीएनजी किट की गाड़ियां भी एलपीजी संकट के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। सीएनजी किट की 90 फीसदी गाड़ियां एलपीजी सिलेंडर से चलती हैं और यह सिलेंडर ब्लैक मार्केटिंग से ही वाहन मालिकों तक पहुंचते हैं। शहर में कहीं भी एलपीजी सिलेंडरों से सीएनजी किट में गैस की रीफिलिंग होते दिखाई दे जाती है। जिले में जितने कामर्शियल कनेक्शनधारक हैं, उनमें से 10 फीसदी भी महीने में कामर्शियल सिलेंडराें की डिलीवरी नहीं उठाते यानि 90 फीसदी कामर्शियल कनेक्शनधारक भी अपने प्रतिष्ठानों में हर महीने घरेलू गैस फूंक रहे हैं। यह गैस भी आम उपभोक्ताओं के हक से कटकर ब्लैक मार्के टिंग के जरिए ही इन तक पहुंचती है। पिछले दिनों एडीएम की मौजूदगी में हुई बैठक में गैस कंपनियों के अधिकारियों की दलील थी कि उनके यहां एजेंसियों के जितने उपभोक्ताओं का डाटा है, उसके हिसाब से वह हर दिन रीफिल की सप्लाई करते हैं। अब एजेंसियों ने अपने स्तर से कितने कनेक्शन चालू कर रखे हैं, यह उनकी समस्या है। उनके यहां से रीफिल की कोई पेंडिंग नहीं रहती। कंपनी वालों का यह खुलासा साबित करता है कि एजेंसियों ने अपने स्तर से फर्जी नाम-पतों से कई अनाधिकृत कनेक्शन चला रखे हैं, जिनसे हर महीने गैस की बड़े पैमाने पर ब्लैक होती है।
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