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समस्याओं के मकड़जाल में घिरा टैक्सटाइल उद्योग

Hathras

Updated Thu, 31 May 2012 12:00 PM IST
हाथरस। देश-विदेश में धाक जमाने वाला यहां का टैक्सटाइल उद्योग अब समस्याओं के मकड़जाल में घिर गया है। सरकारी प्रोत्साहन और आर्थिक मंदी के चलते यहां के निर्यातक भी अब परेशान हैं। ट्रांसपोटेशन की समस्या, लेबर की कमी भी उनके कारोबार में आड़े आ रही है। इस उद्योग के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां के कारोेबारियों को सस्ते रेट पर औद्योगिक क्षेत्र में भूमि नहीं आवंटित की जा रही। इतना ही नहीं, कच्चा मैटेरियल भी काफी दूर से यहां के कारोबारियोें को मंगाना पड़ रहा है और यह भी कारोबार में एक बड़ी अड़चन है। आजादी से पहले किसी समय में यहां तीन बड़े-बडे़ कॉटन मिल थे। इन मिलों में रूई से धागा बनता था और उसके बाद यह धागा बाहर भेजा जाता था। पुराने जानकारोें की मानें तो हाथरस रूई की भी एक बड़ी मंडी था और यहां आसानी से रूई मिल जाती थी। सरकारी सुविधाओं के अभाव में ये तीनों मिल घाटे में चले गए तो बिजली कॉटन मिल को एनटीसी (नेशनल टैक्सटाइल कारपोरेशन) ने टेकओवर भी किया, फिर भी यह मिल घाटे से नहीं उबर पाया और डेढ़ दशक पहले बंद हो गया। इतना ही नहीं, पिछले कुछ समय में तो इन बडे़-बडे़ कॉटन मिलों में कॉलोनियां भी कट र्गइं। जब यहां बड़े-बड़े कॉटन मिल थे, तभी से यह धंधा यहां फला-फूला। कारोबारियों ने छोटे और बडे़ स्तर पर यहां अपनी फैक्ट्रियां भी लगा लीं। अभी भी यहां तीन दर्जन से ज्यादा छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां हैं। इनमें से कुछ में केवल सिंगल यार्न का डबल यार्न बनता है, जबकि कुछ बड़ी फैक्ट्रियों में गलीचे, बाथमेट, रजाई कवर, दरी, कालीन, चादर आदि बनते हैं। यहां का बना माल यूएसए, जापान, आस्ट्रेलिया और अरब देशों में जाता है। इस समय यहां आधा दर्जन ऐसी बड़ी फैक्ट्रियां हैं, जो माल एक्सपोर्ट करती हैं। इस कारोबार से यहां प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 10 हजार लोग जुड़े हुए हैं। बड़ी फैक्ट्री वाले छोटी फैक्ट्रियों को माल ठेके पर दे देते हैं। काफी छोटी फैक्ट्रियों में भी काम होता है। कच्चा माल इस समय हरियाणा, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश से आता है और उसके बाद यहां यह माल तैयार होता है। पावरलूम और हैंडलूम दोनों की तरह के आइटम यहां तैयार होते हैं। यह कारोबार कई समस्याओं से जूझ रहा है। किसी समय में यहां के कारोबारियों को कच्चा माल यूपी से ही मिल जाता था, लेकिन अब यूपी में ज्यादातर सूत मिल बंद हो गए हैं। ऐसे में इन्हें काफी दूर से माल मंगाना पड़ता है। ट्रांसपोटेशन की समस्या भी यहां इस कारोबार पर असर डाल रही है। बाहर माल भेजने के पर्याप्त साधन यहां से नहीं हैं। इसके अलावा काफी कारोबारी ऐसे में जिन्हें उचित दरों पर औद्योगिक क्षेत्र में भूमि नहीं मिल रही। कारोबारियों की मानें तो उल्टे प्रदूषण फैलाने के नाम पर उनका उत्पीड़न और किया जाता है। इतना ही नहीं, यहां इस तरह का कोई सेंटर भी नहीं बनाया गया, जिसमें कारीगरों को प्रशिक्षण आदि देकर और ज्यादा ट्रेंड बनाया जा सके। इन्हीं सब कारणों की वजह से कुछ कुछ सालोें में कई कारोेबारियों की फैक्ट्रियां भी बंद हो गई। आर्थिक मंदी का असर भी इस कारोबार पर पड़ रहा है।
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