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चूल्हे पर पकने लगी दाल, बनने लगी रोटी

Hardoi

Updated Sat, 29 Sep 2012 12:00 PM IST
‘रसोई गैस को लेकर केंद्र सरकार के फैसले का असर परिषदीय स्कूलों पर दिखने लगा है। कल तक जहां गैस पर मिड-डे मील बनता था, आज उन स्कूलों में चूल्हे जल रहे है।ं कारण साफ है कि संबंधित एजेंसियों ने एक साल में मात्र छह सिलेंडर देने की मजबूरी जताते हुए मार्च तक मात्र तीन सिलेंडर और देने की बात कही है। वहीं स्कूल के प्रधानाध्यापकों का कहना है कि एमडीएम में प्रतिमाह तीन से चार सिलेंडर खर्च होते हैं। ऐसे मेें वह गैस पर खाना कैसे बनवा सकेंगे। फिलहाल कुछ स्कूल ऐसे हैं, जिनमें गैस न मिलने से खाना बनना भी बंद हो गया है। मिड-डे मील को बनवाने को प्रति स्कूल को रसोई गैस और बर्तन खरीदने को पांच हजार रुपए दिए जाते हैं। इसके बाद कनवर्जन कास्ट से तेल, मसाला से लेकर रसोई गैस आदि की व्यवस्था करनी होती है। प्राथमिक स्कूल के बच्चों के लिए 3.11 पैसे प्रति छात्र और 100 ग्राम गेहूं/चावल दिया जाता है, जबकि उच्च प्राथमिक स्कूल के छात्र के लिए 4.65 पैसे और डेढ़ डेढ़ सौ ग्राम गेहूं/चावल प्रति छात्र देने का प्रावधान है। रसोई गैस के बढ़े दामों ने स्कूलों का बजट बिगाड़ दिया है।’
हरदोई/कछौना। जिले के 19 विकास खंडों में 3,858 परिषदीय स्कूल हैं, इनमें 2,833 प्राथमिक और 1,025 उच्च प्राथमिक स्कूल शामिल है। इन स्कूलों में मिड-ड ेमील न बनने से पूर्व में गैस कनेक्शन किए गए थे। अधिकांश स्कूलों में गैस पर ही बच्चों का मिड-डे मील बनता था, पर रसोई गैस को लेकर केंद्र सरकार के फैसले के बाद स्कूलों मेें भी गैस की किल्लत शुरू हो गई।
बताया जाता है कि एमडीएम के लिए प्रति स्कूल 3 से 4 सिलेंडर की प्रतिमाह जरूरत होती थी, जिसे स्कूल के प्रधानाध्यापक या प्रधान के माध्यम से एजेंसी द्वारा मंगा लिया जाता था। 14 सितंबर के बाद संबंधित गैस एजेंसियों ने भी निर्धारित कोटे से ज्यादा सिलेंडर देने को लेकर हाथ खड़े कर दिए हैं। इसको लेकर अब प्रधानाध्यापक/प्रधान के समक्ष एमडीएम बनवाने का संक ट खड़ा हो गया है। फि लहाल अधिकांश स्कूलों में चूल्हे पर खाना बनने लगा है। उधर, रसोई से उठते चूल्हे के धुएं से स्कूल के टीचर और बच्चे भी परेशान हैं। हैरत की बात है कि इस मामले को लेकर महकमे के आला अधिकारी भी चुप्पी साधे हैं।
उधर, कस्तूरबा गांधी आवासीय स्कूलों में बच्चों को खाना देने के लिए प्रति माह स्कूल में 10 से 12 सिलेंडर की जरूरत होती है। जिले में 20 स्कूल हैं, जिनमें अब गैस का संकट खड़ा हो गया है। स्कूल सूत्रों की मानें तो उन्हें एक हजार तीस रुपए में सिलेंडर लेना पड़ रहा है। इस बाबत स्कूल की लेखाधिकारियों ने बीएसए को भी जानकारी दी है। उधर, जिले में कुल प्राथमिक विद्यालय 2,833 और उच्च प्राथमिक स्कूल 1,025 हैं, जबकि सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल 44 और माध्यमिक स्कूल 76 हैं। प्राथमिक स्कूलों में 4,12,407 और उच्च प्राथमिक स्कूलों में 1,39,829 बच्चे पढ़ते हैं, जिनके सामने खाने का संकट खड़ा हो गया है।
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लकड़ी और कंडे के भाव भी चढ़ने लगे
हरदोई। कभी लकड़ी जलाकर खाना बनाना आसान था, लेकिन महंगाई का असर इस पर थी दिख रहा। ठेकी पर पूछे जाने पर लकड़ी का भाव 500 रुपए कुंतल और कंडा एक रुपए में दो बिक रहे हैं। ऐसे में चूल्हा जलाना भी आसान होता नहीं दिख रहा है।
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खुले बाजार में 1,025 मेेें बिक रहा सिलेंडर
हरदोई। रसोई गैस के दाम बढ़ने और कोटा निर्धारित होने से गैस की कालाबाजारी भी धड़ल्ले से होने लगी है। लोगों की मानें तो अब खुले बाजार में एक भरा सिलेंडर लेने के लिए उपभोक्ता को 1,025 रुपए देने पड़ रहे हैं। इसके बाद भी उपभोक्ता को सिलेंडर के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है।
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‘गैस कंपनियों के अफसरों से बात कर कोई रास्ता निकाला जाएगा। इस बाबत वह अग्रिम आदेशों का इंतजार कर रहे हैं। इस संबंध में जो भी दिशा निर्देश शासन से मिलेंगेे उस पर अमल कराया जाएगा।’- एसपी सिंह, जिला पूर्ति अधिकारी
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‘रसोई गैस संकट के बाबत अभी तक किसी स्कूल ने शिकायत नहीं भेजी है। फिर भी वह जानकारी लेकर इस बाबत डीएम से बात कर समस्या का निराकरण कराने का प्रयास करेंगे। खाना बनाने के लिए स्कूल में निर्धारित छह से ज्यादा सिलेंडरों की जरूरत पड़ेंगी।’-मसीहुज्जमा सिद्दीकी, बीएसए
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छात्राएं खा रहीं आलू और पानी की सब्जी
हरदोई। कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका स्कूलों में हो रहे खेल की पोल खुलती जा रही है। जिला समन्वयक बालिका शिक्षा ने शुक्रवार को हरियावां व पिहानी विकास खंड के स्कूलों का निरीक्षण किया। स्कूल में छात्राओं की संख्या कम मिली, पर अभिलेखों में ज्यादा दर्ज थी। छात्राओं को हरी सब्जी के स्थान पर पानी की सब्जी खिलाई जाती मिली। जिला समन्वयक बालिका शिक्षा जौहरी ने बताया कि निरीक्षण के दौरान लेखाकार अनुपस्थित मिलीं और वार्डन सप्ताह में एक दिन ही रुकती हैं। स्कूल में मात्र 42 छात्राएं ही उपस्थित थीं, जबकि अभिलेखों पर 60 छात्राएं दिखाई गईं थीं। स्कूल में हरी सब्जी कभी बनाई ही नहीं जाती। डीसी ने बताया कि उसके बाद वह कस्तूरबा गांधी स्कूल पिहानी पहुंचे तो वहां की हालत ज्यादा खराब मिली। वार्डन ने अभिलेख दिखाने से ही मना कर दिया और भविष्य में स्कूल न आने की चेतावनी दी। यहां पर भी मात्र 50-60 छात्राएं ही उपस्थित मिलीं। छात्राओं ने कभी भी हरी सब्जी न देने की बात कही। जब सब्जी कम पड़ जाती है तो उसमें पानी बढ़ा दिया जाता है। जौहरी ने निरीक्षण आख्या बीएसए को दी है।
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