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धूमधाम से महाराजा का विसर्जन

Hardoi

Updated Fri, 28 Sep 2012 12:00 PM IST
हरदोई। वंशीनगर स्थित नागेश्वर नाथ मंदिर में सिद्धि विनायक मराठा मंडल व सराफा कमेटी के तत्वावधान में चल रहे छठवें गणेश महापूजन उत्सव के नवें दिन आरती के बाद गणेशजी महाराज की भव्य विसर्जन शोभायात्रा निकाली गई। उधर, श्राद्ध पक्ष में पितरों के श्राद्ध का श्राद्ध का समय आ गया है। इस बार 30 सितंबर से श्राद्ध पक्ष शुरू हो रहे हैं, जो 15 अक्तूबर तक चलेेंगे।
शोभायात्रा की अगुवाई सजे धजे गजराज ने की, तो पीछे सजी हुई बग्घियों पर झांकियाें की छटा देखते ही बन रही थी। शोभायात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई नैमिषधाम पहुंची, जहां गोमती की धारा में विसर्जन किया गया। इस मौके पर मनीष चतुर्वेदी, संजीव रस्तोगी, अनिल मदन, लालू सिंह, राजू श्रीवास्तव, रानू त्रिवेदी, मोनी पाठक, विमलेश मिश्रा, समीर सिंह, राजू दीक्षित, अभिषेक मिश्रा आदि मौजूद थे। उधर, 30 सितंबर से पितरों को श्राद्ध देने का सिलसिला शुरू होगा, जो 15 अक्तूबर तक चलेगा।
ज्योतिष निर्णायक मंडल अध्यक्ष आचार्य पंडित राम शंकर मिश्र ने बताया कि भाद्र पद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा 30 सितंबर से 15 अक्तूबर तक पितृ पूजा का ही समय शास्त्रों में माना है। इस काल खंड में देव पूजा संक्षिप्त रूप से करनी चाहिए, पितरों की उपासना से जीव का प्रत्यक्ष हित लाभ है। श्राद्ध पक्ष में पितरों के श्राद्ध के लिए कुछ विशेष वस्तुओं और सामग्री का उपयोग जरूरी तो कुछ को निषेध कर दिया जाता है। शास्त्रों के जानकारों की माने तो श्राद्ध कर्म व पूजा में गंगा जल, दूध, शहद, कुश व तिल का खास महत्व है। इनका यथोचित उपयोग करना न चूके। तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुण पर सवार होकर विष्णुलोक को चले जाते हैं।
तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं। सोने, चांदी, कांसे व तांबे के पात्र उत्तम हैं। इनके न होने पर पत्तल उपयोग में लाई जा सकती है। केले के पत्ते पर श्राद्ध न कराएं। रेशमी, केवल, ऊन, लकड़ी, कुश आदि के आसन का उपयोग करें। आसन में लोहा किसी भी रूप में उपयोग नहीं होना चाहिए। चना, मसूर, बड़ा उरद, सत्तू, खीरा, काला उरद, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसाें, काली सरसों की पत्ती, अपवित्र फल व अन्न का श्राद्ध के भोजन में उपयोग न करें।
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