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सूचना का अधिकार पारदर्शी, पर अफसर बने चकरघिन्नी

Hardoi

Updated Wed, 29 Aug 2012 12:00 PM IST
‘सूचना का अधिकार कानून का उद्देश्य भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने व योजनाओं को पारदर्शी बनाने का है, जो शायद काफी हद तक हुआ भी, पर अफसोस आरटीआई की आड़ में कई संगठन भी हावी हो गए, जिनका सिर्फ काम सूचनाएं मांगना ही रह गया। आरटीआई से जहां एक ओर विभागों की चहारदीवारी से योजनाओं को पात्रों की ओर भागने का रास्ता मिला, वहीं सूचनाओं की आड़ से विभाग प्रमुखों से ठगी के धंधे की भी शुरुआत हुई। अफसरों की मानें तो अधिकांश सूचनाएं ऐसी मांगी जा रहीं, जिनका न सिर होता न पैर। वाजिब सूचनाएं देते भी हैं, पर जब आड़ी तिरछी सूचनाओं को मांगने के बाद उन्हें फंसाने का काम किया जाता है, तो तकलीफ होती है। विकास भवन में ही कई विभाग ऐसे हैं, जहां पर सूचनाएं मांगने वालों का अंबार है, तो कई जगह ऐसी है जहां पर सूचनाएं मांगने वाले भटक रहे हैं। जिले में सूचना के अधिकार के तहत सूचना न देने पर अफसरों तक को न सिर्फ आयोग को जवाब देना पड़ा, बल्कि 25-25 हजार तक का जुर्माना देना पड़ गया है। इनमें तत्कालीन एडीएम बीएल अग्रवाल, डीडीओ अनिल कुमार, तत्कालीन बीडीओ हरिश्चंद्र, डीपीआरओ समेत कई दर्जन ग्राम विकास व पंचायत अधिकारी शामिल हैं। जिन पर जुर्माना लगा है।’
इंसेट---
वर्ष 05 से विकलांग पेंशनधारकों की सूची का इंतजार
हरदोई। अब तक विकलांग कल्याण विभाग से वित्तीय वर्ष में पांच सूचनाएं ही मांगी गई हैं, पर सभी एक से बढ़कर एक। एक ओर विभाग को हाईटेक करने की कवायद की जा रही, तो दूसरी ओर सूचना मांगने वालों क ी फाइलें ढोने में भी अफसर जुटे हुए हैं। प्रभारी जिला विकलांग कल्याण अधिकारी शंभू शरण श्रीवास्तव का कहना था कि सूचनाएं ऐसी मांगी गई हैं, जिनको देखकर उनको जुटाने में ही काफी वक्त जाया हो जाएगा, पर अधिकार है तो उसका पालन करना ही होगा। बताया कि एक सूचना में तो वर्ष 05 से लेकर अब तक जितने लोगों को भी विकलांग पेंशन दी गई, उनका नाम पता व उनके खातों की संख्या मांगी गई है। निर्धारित समय में सूचना जुटाने को वह जुटे हुए हैं। उनके पास दो बाबू हैं, उनसे विभाग का काम लें या फिर सूचनाएं तैयार करवाएं। बताया कि अब तक इस वित्तीय वर्ष में 15 सूचनाओं को मांगा जा चुका है। जिसमें पेंशन क्यों काटी गई और पेंशन दी क्यों नहीं जा रही, की जानकारी मांगी गईं हैं।
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एक को चाहिए पूरी योजना का ही लेखा जोखा
हरदोई। विकलांग कल्याण की भांति ही युवा कल्याण विभाग का भी दर्द है। वित्तीय वर्ष में अब तक 24 से ज्यादा सूचनाएं मांगी गई है। इस वित्तीय वर्ष अब तक सात सूचनाओं को मांगा गया है। जिला युवा कल्याण विभाग आरए सैनी का कहना था कि उनसे अब तक 24 से ज्यादा सूचनाओं को मांगा गया है और इस वित्तीय वर्ष में सात सूचनाएं मांगी गईं हैं, जिसको वह दे भी रहे हैं, पर एक ने 10 रुपए का शुल्क लगाकर ऐसा फार्म भरा है, जिसमें तो वह सूचनाएं देते ही रहेंगे, तो भी कम पड़ जाएगा। उसे पायका योजना में जिन गांवों में काम चल रहा, कितना काम हुआ, कितना पैसा आया, कहां-कहां लगा,कितना लग गया, सब कुछ चाहिए। बताया कि एक बाबू है सारा कुछ विभाग के लिए करेगा या फिर सूचना मांगने वालों के लिए। अगर नहीं देते तो उन पर जुर्माना लगेगा। जो सूचना मांग रहा है, वह एक गांव का 17 साल का लड़का है, जिसके नाम से सूचना मांगी गई है। आप सोच लीजिए कि वह इन सूचनाओं का क्या करेगा।
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वित्तीय वर्ष में 147 सूचनाओं के लिए आए आवेदन
हरदोई। बाल विकास पुष्टाहार विभाग भी इस अधिकार में अपने को काफी लाचार मान रहा है। सूचनाओं को मांगने के ढंग व मांगने वाले घूम फिर कर जाने पहचाने चेहरों को देख अफसर का कहना है कि भर्ती निकलने व सूची प्रकाशित होने के बाद सूचनाओं को लेकर आवेदन आने लगते हैं। इसके अलावा पुष्टाहार भिजवाने के बाद भी सूचनाएं मांगी जाने लगती हैं। अधिकार सही है, पर इसका प्रयोग गलत ढंग से किया जा रहा है। जिला कार्यक्रम अधिकारी प्रकाश कुमार का कहना था कि अब तक उनके विभाग से 400 से ज्यादा इसी वित्तीय वर्ष में सूचनाएं मांगी जा रही हैं और वह दे रहे है। इस वित्तीय वर्ष में 147 सूचनाओं के आवेदन आए हैं। 38 उनके स्तर की हैं, तो 109 ब्लाक स्तर की, जिनको निस्तारित करवाया जा रहा है। एक बाबू इसी पर लगा रखा है। तह तक किसी भी सूचना के जाइए नाम अलग-अलग होंगे। इनको मांगने वाले जाने पहचाने नजर आएंगे। सब कुछ जानते हुए भी कानून है, तो उसका पालन करना है।
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सफाईकर्मियों की तैनाती की सूचना ने बढ़ाया ग्राफ
हरदोई। जिला पंचायत राज विभाग की यदि बात करें, तो यहां भी सूचना के अधिकार को लेकर अलग से व्यवस्था करनी पड़ रही है। बाबू को सूचनाओं को एकत्र करने को लगाना पड़ रहा है। जिला पंचायत राज अधिकारी दया शंकर सिंह का कहना है कि इस वित्तीय वर्ष 116 सूचनाएं मांगने के लिए आवेदन इस अधिकार के तहत किए गए हैं, पर अधिकांश आवेदन स्वार्थवश ही करने की बात अंतत: सामने आती है, लेकिन कानून के दायरे में रहक र सूचनाएं तो दी ही जाती हैं, लेकिन सफाईकर्मियों की तैनाती से लेकर ग्राम पंचायतों में आ रही धनराशि को लेकर सूचनाओं को मांगा जा रहा है।
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यह है सूचना का अधिकार का कानून
हरदोई। सूचना के अधिकार को 12 अक्तूबर 05 को लागू किया गया था, जिसमें कोई भी सूचना मांगने वाला 10 रुपए का शुल्क अदा करने के बाद किसी भी विभाग से दस्तावेज, नोटिस, फोटो कापी, प्रिंट आउट, वीडियो कैसेट आदि प्राप्त कर सकता है। इसके लिए इन पर आने वाले खर्चों का वहन उसको स्वयं करना होगा। नियम यह है कि आवेदन के बाद विभाग के जनसंपर्क अधिकारी को 30 दिनों के भीतर सूचना देनी होगी। या फिर न देने पर कारण बताना होगा। न देने पर आवेदन कर्ता विभागीय अधिकारी के पास अपील कर सकता है। यहां भी न मिले तो तीसरी अपील राज्य सूचना आयोग को की जाती है। जिसके बाद वहां से जुर्माना भी किया जाता है।
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बोले, सीडीओ
‘सीडीओ एके द्विवेदी का कहना है कि सूचना का अधिकार एक तरह से रामबाण है, पर वहां पर जहां गलत कार्य हो रहा हो। बेवजह विभागीय समय को नष्ट करवाना भी सही नहीं है। इस समय में कार्य करने से अन्य पात्रों को लाभ हो सकता, पर कानून के दायरे में रहकर काम करना ही है सूचनाएं दें, पर विभाग यह ध्यान रखे कि गलत हाथों में सूचनाएं देने से बचें।’
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