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65 साल बाद भी ‘अंग्रेजियत’ के चंगुल में हिंदी

Hardoi

Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST
‘हम आजाद हैं, हमें हिंदुस्तानी होने पर गर्व है। सचमुच हम सबको हिंदुस्तानी होने पर गर्व है। हर शख्स चाहे किसी भी धर्म का क्यों न हो, वह आजादी के 65 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है, पर इस जश्न में हिंदुस्तान की हिंदी आज भी अपने वजूद को कायम न रख पाने के कारण कोने में गिनती के लोगों के ही बीच की होकर रह गई है। अंग्रेजों की अंग्रेजी आज भी न सिर्फ हिंदुस्तानियों के बीच जिंदा है, बल्कि बखूबी फल फूल रही है, जबकि हिंदुस्तान की हिंदी बस नाम मात्र की बचती नजर आ रही है। हिंदी को सबसे ज्यादा संकोच तो इस बात का लग रहा है कि स्वतंत्रता दिवस पर बधाई भी एसएमएस या मुंह जवानी जैसे भी दी जा रही, वह भी अंग्रेजों की जुबानी...हैप्पी इंडिपेंडेन्स डे...। अपने ही देश में अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी के साथ बेगाना सा व्यवहार किया जा रहा है। अंग्रेजों के छोड़ के जाने का हम जश्न मना रहे हैं, पर उनकी भाषा को आज भी हम सिर आंखों पर बैठाए है और अपनी भाषा को गुमनामी में डाले हुए हैं।’
हरदोई। देश को आजादी वर्ष 1947 को प्राप्त हो गई थी। हम तब से लेकर इस बार 65 साल पूरे कर रहे हैं और आजादी का एक जश्न मना रहे हैं, पर सोचने वाली बात यह है कि जश्न किस बात का मना रहे हैं, क्योंकि इन दिनों हिंदुस्तान की हर चीज कहीं न कहीं किसी की गिरफ्त में ही है।
युवा जहां बेरोजगारी से लेकर नशे की गिरफ्त में हैं, वहीं गरीब महंगाई से लेकर तंगहाली की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। महिलाएं जहां अपने आपको असुरक्षा की बंदिशों में जकड़ा पा रही हैं, तो सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार का मकड़जाल फैला हुआ है। यही नहीं जब हिंदुस्तान में हिंदी बोलने पर टैक्स देना पड़ जाए और उसके बाद भी हम आजाद हिंदुस्तान होने का दम भरें तो आश्चर्य ही होगा। शिक्षा विभाग से जुड़े अभय यादव का कहना है कि आज जहां भी जाओ वहां सिर्फ इंग्लिश का ही जोर है हिंदी बेचारी तो बहुत कमजोर है। बैंक में जमा करने से लेकर निकासी तक के फार्म अंग्रेजी में ही प्रचलित है। हिंदी में तो इन्हें कहते क्या हैं किसी को मालूम तक नहीं है।
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निचली कोर्टों में हिंदी का प्रचलन बढ़ा
हरदोई। अधिवक्ता संघ अध्यक्ष रामेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि कोर्ट की बोलचाल व अधिकांश प्रयुक्त होने वाली भाषा को देखे तो पता लगता है कि सिविल कोर्ट से आदेश पारित खर्चों आदि का ब्योरा डिक्री में ही समाहित होता है, पर इंग्लिश के इस शब्द को हिंदी में क्या कहते हैं कोई नहीं जानता। इसके अलावा वारंट, कोर्ट फीस, फाइल, स्टांप, टिकट आदि अंग्रेजी के शब्द हैं और वहीं कहे जाते हैं, पर हिंदी में इन्हें कोई नहीं जानता। तोमर का कहना है कि हिंदी सचमुच पहले गुम हो रही थी जिसको बचाने का प्रयास हुआ। जिला स्तर की कोर्टों में बहस, आदेश, नकल सभी कुछ हिंदी में ही होती है हां ऊंची अदालतों में आज भी अंग्रेजी में सब कुछ होता है। आम बोलचाल में जो शब्द लोगों की जुबां पर रट गए, वहीं प्रयोग किए जाते हैं।
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स्वतंत्रता कठिन, इंडिपेंडेन्स डे सरल
हरदोई। जिले के एक नामचीन स्कूल में पढ़ने वाली आद्या तिवारी से जब उसका नाम हिंदी मेें लिखने को कहा गया तो उसको कुछ समय लगा, पर अंग्रेजी कहते ही उसने नाम लिख डाला। स्वतंत्रता दिवस पर वह अनभिज्ञता सी जताते हुए मुंह सा बनाई, पर समझाने पर वह अच्छा इंडिपेंडनेन्स डे...जानती हूं। अब आप ही अंदाजा लगा सकते हैं कि अंग्रेजी एवं हिंदी को कहां-कहां सम्मान मिल रहा है।
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रसोई धुआं, अब तो सिर्फ किचन
हरदोई। स्कूल ही नहीं घर की बात भी करें तो हिंदी यहां भी अस्तित्वहीन लगती है। ग्रहणी अनुराधा का कहना है कि घर पर भी हिंदी या अंग्रेजी की ओर तो किसी का ध्यान ही नहीं जाता है, जो शब्द चलन में हैं उन्हीं का प्रयोग किया जाता है। जैसे रसोई अटपटा लगता है, जबकि किचन सभी को मालूम है। बच्चों तक को खिड़की से ज्यादा विंडो कहना ही समझ आता है। इसके अलावा रोज मर्रा के शब्दों में मग से लेकर वाटर व टावल से लेकर बाथरूम ही चलन में है।
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अभी ‘गजटेड अफसर’ की दरकार
सरकारी दफ्तरों में बैठने वाले अफसर भी परेशान
ब्रिटिश हुकूमत ने खजांची पद पर मांगे थे आवेदन
हरदोई। विकास भवन के एक अफसर अभी अपनी कुर्सी संभाल कर फाइलों को टटोल ही रहे थे, तभी उनके कार्यालय में युवक पहुंच गया। पालीथिन से फार्मों का मोटा बंडल निकाल कर आगे बढ़ाते हुए उनसे हस्ताक्षर का अनुरोध करने लगा। झुंझलाकर अधिकारी बोल पड़े कि आखिर वह ही क्यों करें, तो तपाक से जवाब आया कि आप गजटेड अफसर है न इसलिए।
गजटेड नाम से सिर्फ इन दिनों यहीं अधिकारी नहीं परेशान, बल्कि हर वह अधिकारी परेशान हैं जिसे कभी न कभी राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए नोटीफि केशन में गजटेड अधिकारी का तमगा दिया गया था। राज्य सरकार ने पूर्व के वर्षों में जो गजटेड का नोटीफिकेशन जारी किया था, उसमें पहले श्रेणी दो के वेतनमान पाने वाले अफसरों को गजटेड अफसर कहा गया था, जिसमें तहसीलदार, सीएमओ, बीडीओ, डायट प्राचार्य सहित सभी डाक्टर व अधिकारी वर्ग को भी शामिल किया गया था, पर पिछले वर्षों से इस ओर कोई भी नोटिस सरकार द्वारा नहीं जारी की गई। फिर भी कोई भी रिक्तियों का आवेदन आते ही उनके कार्यालयों के बाहर आवेदकों का रेला नजर आने लगता है।
अफसरों की माने तो रिक्तियां कहीं की भी निकलें, जितनी उनको जानकारी हो जाती है, उतनी शायद बेरोजगार को भी नहीं होती। बैंक में पीओ के पद को यदि किसी को आवेदन करना होता है, तो राजपत्रित अधिकारी के हस्ताक्षर चाहिए। एक ही आवेदन पर एक बार नहीं, बल्कि चार-चार बार हस्ताक्षर मांगे जाते हैं। अफसरों का कहना है कि प्रदेश में इंजीयनियरिंग व मेडिकल कालेजों में दाखिला लेने को भी गजटेड से साइन कराने का ट्रेंड चला है, जो उन पर अतिरिक्त बोझ डाल रहा है। आजादी मिले 65 साल से ज्यादा का समय हो गया, पर गजटेड शब्द जैसे कई शब्द उनका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं।
गजटेड शब्द आया कहां से। इस बात को कई अफसर नहीं बता सके, पर बड़े अफसरों से पूछने पर पता चला कि ब्रिटिश हुकूमत में खजांची के पद पर आवेदन मांगे गए थे। जिस पर अंग्रेजी हुकूमत को ईमानदार लोगों की जरूरत थी, क्योंकि उनको खजाने से संबंधित काम उनसे लेना था। जिसके बाद आस पास के संभ्रांत लोगों से आवेदक का चरित्र कैसा है यह लिखवाकर लाने को कहा गया। इसी से गजटेड का उदय बताया जाता है। राज्य सरकारों द्वारा समय समय पर गजटेड अफसरों में किनको रखा गया, नोटिस जारी की जाती है।
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