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विद्रोह की तोपों से गूंजा था संडीला

Hardoi

Updated Wed, 01 Aug 2012 12:00 PM IST
हरदोई। हरदोई जिला अवध राज्य का एक हिस्सा था, पर रुहेलखंड व लखनऊ के बीच में स्थित होने से अवध के नवाबों व रुहेलों की आपसी खींचतान का असर जिले पर बराबर पड़ता रहा। स्वतंत्रता दिवस की यादों के तरोताजा होने के बाद बात संडीला व उसके बेरूआ किले की न हो यह हो ही नहीं सकता।
अवध के नवाबों के जमाने में भी हरदोई पर नवाबों का कब्जा अकसर कमजोर होता रहा। 1857 के संग्राम ने मानों इस क्षेत्र को अपने बंधन फेंककर खड़े होने का एक मौका प्रदान किया। इस मौके को यहां के लोगों ने हाथ से जाने नहीं दिया। लखनऊ में विद्रोह हो गया यह संदेश जैसे ही जिले में पहुंचा, संडीला तथा अन्य स्थान विद्रोह की आवाज से गूंज उठे। कंपनी का शासन एकदम लड़खड़ा गया। गोल्ड बैस्टन जा हरदोई में शासन करने को भेजे गए थे, वह यहां से भागने को मजबूर हो गए। उनकी पराजय के बाद हचिसन 400 जवानों के साथ जिले में भेजे गए।
गंगा पार करके जो सेना की टुकड़ी भेजी गई थी, उनको क्रांतिकारियों ने मौत के घाट उतार दिया। दबाव पड़ने से डिप्टी कमिश्नर को मल्लावां छोड़ कर भागना पड़ा। जिले के राजपूत और पठानों ने जो कंपनी सेना के सिपाही थे, उन्हाेंने क्रांतिकारी सेनाओं को मजबूत किया और बड़ी क्रांतिकारी सेना जिले में खड़ी हो गई। एक वर्ष तक पूरा जिला स्वतंत्र रहा। ब्रिटिश शासन का नामोनिशान तक मिट गया। बिग्रेडियर हाल हरदोई होते हुए सीतापुर की ओर बढ़े, जबकि बिग्रेडियर बारकर ने लखनऊ से जाकर हाल की टुकड़ी को मदद पहुंचाई। बारकर के पास छह तोपें थी और काफी संख्या में सैनिक भी थे। उसने संडीला पर हमला किया। उसको रोकते समय क्रांतिकारियों को काफी क्षति उठानी पड़ी।
उसके बाद बेरूआ के प्रसिद्ध किले पर हमला किया। हाल और बारकर ने मिलकर रूइया के प्रसिद्ध किले पर हमला कर दिया, पर क्रांतिकारियों ने किला खाली कर दिया। नवंबर 1858 तक पूरे जिले से क्रांतिकारी बाहर कर दिए गए और अंग्रेजों की सेना का अधिकार जिले पर हो गया। 1857 के संग्राम में अवध के लगभग सभी जिलों ने अप्रतिम शौर्य का परिचय दिया। जरूरत पड़ने पर प्रथम कोटि के नेता और सेनानायक ऊपर आए थे। रूइया के नरपत सिंह और बेरूआ के गुलाब सिंह इसी कोटि के जुझारू नेताओं में से थे। इन वीरों ने अपने जीवन के अंतिम दौर तक तलवार नीचे नहीं झुकाई।
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