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छप्पर में स्कूल, कैसे बनेंगे ‘लाटसाहब’

Hardoi

Updated Mon, 30 Jul 2012 12:00 PM IST
‘प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की नींव मजबूत करने का तो दावा किया जा रहा, पर स्कूलों की नींव ही कमजोर है। बेसिक शिक्षा विभाग के परिषदीय स्कूलों में कहीं जर्जर इमारतें हैं, तो कहीं छतें टपक रही हैं। मान्यता प्राप्त स्कूलों का तो हाल ही खराब है। मानकों का पालन तो दूर छप्पर और टीन शेड के नीचे विद्यालय चलाए जा रहे हैं। बिजनौर जिले में विद्यालय की इमारत गिर जाने से हुई घटना से खलबली मची हुई है, पर जिले में भी बहुत से स्कूल ऐसे हैं जिसमें खतरों के साए में बच्चे शिक्षा लेने को मजबूर हैं। स्कूलों की मरम्मत और रंगाई पुताई के लिए प्रति वर्ष 5-5 हजार और उच्च प्राथमिक स्कूलों के लिए 7 से 10 हजार रुपए प्रति वर्ष दिए जाते हैं। जिले के ढाई हजार से ज्यादा प्राथमिक और एक हजार से ज्यादा उच्च प्राथमिक स्कूलों में प्रति वर्ष लाखों रुपए भेजे जाते हैं, पर स्कूलों की हकीकत खेल की पोल खोल रही है।’
हरदोई। बिजनौर जिले में एक मान्यता प्राप्त स्कूल की इमारत ने कई बच्चों की जान ले ली, जिससे पूरे प्रदेश में खलबली मची हुई है, पर अगर देखा जाए तो जिले में भी अधिकांश मान्यता प्राप्त स्कूलों में खतरों के साए में बच्चों को शिक्षा दी जाती है।
जिले के 19 विकास खंडों में संचालित 1150 मान्यता प्राप्त और 44 सहायता प्राप्त स्कूलों में करीब 80 फीसदी स्कूल मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं। आधे स्कूल तो खुलेआम मानकों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। कागजों पर तो स्कूलों के पक्के भवन हैं। बच्चों के खेलने को मैदान हैं, पर हकीकत सारी व्यवस्था की पोल खोल रही है। कुछ दिन पूर्व बीएसए ने टड़ियावां विकास खंड के हरिहरपुर में स्कूल का निरीक्षण किया तो स्कूल छप्पर के नीचे चलता मिला था। हाल में ही स्कूलों का परीक्षण कराया गया तो इसमें भी पोल खुल गई थी। मानकों का तो बहुत से स्कूल पालन नहीं कर रहे हैं।
पर, भरखनी, शाहाबाद, बिलग्राम, अहिरोरी, कोथावां विकास खंड कई स्कूल ऐसे हैं, जिसमें कुछ की इमारत जर्जर है, तो कुछ छप्पर और खपड़ैल के नीचे चल रहे हैं। शासन स्तर से बच्चों की सुरक्षा को ड़े कदम उठाए गए थे। जिसमें सभी स्कूलों में अग्निशमन संयंत्र लगाने और उनकी इमारत नेशनल बिल्डिंग कोड के अनुरूप होने का फरमान जारी किया गया था। इसके लिए फायर विभाग और पीडब्ल्यूडी से प्रमाण पत्र लेना पड़ता हैै, पर इसमें भी खेल हुआ। स्कूलों के अभिलेखों में सभी में अग्निशमन संयंत्र लगे हैं, पर हकीकत कुछ और है। जो स्कूल छप्परों या टीन शेडों के नीचे चल रहे हैं, उनके पास भी नेशनल बिल्डिंग का प्रमाण पत्र मौजूद है। प्रमाण पत्र देने वालों ने न तो सत्यापन किया और न ही हकीकत देखी बस जुगाड़ और काम हुआ।
केस एक-भरखनी विकास खंड के उच्च प्राथमिक स्कूल बसेलिया की निर्माणाधीन इमारत गिर गई। गनीमत रही कि निर्माण कार्य के दौरान ही यह हादसा हुआ। अगर बाद में होता तो न जाने क्या होता।
केस दो-कोथावां विकास खंड के फत्तेहपुर स्कूल की इमारत निर्माण कार्य के दौरान ही गिर गई। लिंटर गिरने से गुणवत्ता की पोल खुल गई। हालांकि बाद में उसे फिर से दुबारा बनवाया गया।
परिषदीय स्कूल के निर्माण कार्य में उड़ रही गुणवत्ता की धज्जियों के यह चंद उदाहरण हैं। जिले के इन दिनों 1600 अतिरिक्त कक्ष और 330 स्कूलों का निर्माण हो रहा है। कार्य में कैसे खेल किया जा रहा यह किसी भी स्कूल का निरीक्षण कर देखा जा सकता है। निर्माण कार्य से जुड़े लोगों का कहना है कि वर्ष 09 से मूल्यों पर इमारत बनवाई जा रही है। वर्ष 09 में भी प्राथमिक स्कूल की इमारत के लिए तीन लाख 87 हजार और उच्च प्राथमिक के लिए सात लाख 49 हजार थे और अब वर्ष 12 में भी यही है। इसमें भी कमीशन अलग से देना पड़ता है।
इंसेट---
जर्जर इमारतों में पढ़ाए जा रहे बच्चे
हरदोई। केस एक-अहिरोरी विकास खंड के उच्च प्राथमिक स्कूल नीर की जर्जर इमारत है। यह इमारत कभी भी गिर सकती है और हादसा हो सकता है।
केस दो-बावन विकास खंड के सकतपुर की भी इमारत जर्जर हो चुकी है, जो कभी भी गिर सकती है।
यह दोनों स्कूलों की जर्जर इमारत उदाहरण हैं। 19 विकास खंडों और 6 नगर क्षेत्रों में दर्जनों जर्जर इमारतें हैं, जो कभी भी गिर सकती हैं। अफसरों का कहना है कि इन इमारतों में बच्चों को बैठाया नहीं जाता। बच्चों के लिए अतिरिक्त कक्ष बनवाए जा रहे हैं और उसमें बच्चे बैठते हैं, पर अधिकांश स्कूलों में इन्हीं इमारतों के नीचे बच्चे बैठते हैं और जहां पर नहीं बैठते वहां पर छुट्टी के समय यहीं पर खेलते हैं, पर जर्जर इमारतों को न तो गिरवाया जा रहा और न ही उनके स्थान पर दूसरी इमारत बनवाई जा रही है।
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मान्यता के मानक
हरदोई। मान्यता प्राप्त स्कूलों में वैसे तो बहुत से मानक होते हैं और कुछ स्कूलों को छोड़कर कोई स्कूल इनका पालन नहीं करता, पर मान्यता के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण इमारत होती है, जिसमें प्राथमिक के लिए पांच गुणे 10 के तीन और 15 गुणे 20 के पांच कमरे व खेल का मैदान आदि और उच्च प्राथमिक स्कूल के लिए 10 गुणे पांच के तीन व 20 गुणे 25 के पांच कमरे होने चाहिए। बिना इनके मान्यता नहीं मिल सकती।
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‘गड़बड़ी पर जिम्मेदारों पर होगी कार्रवाई’
‘बीएसए मसीहुज्जमा सिद्दीकी ने बताया कि स्कूलों की गुणवत्ता, इमारतों की हालत और अन्य व्यवस्थाओं का निरीक्षण करवा रहे हैं। गड़बड़ी पर जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जाएगी। मान्यता प्राप्त जिन स्कूलों में मानक का पालन नहीं मिलेगा, उन्हें नोटिस दिया जाएगा और सुधार न होने पर मान्यता खत्म कर दी जाएगी।’
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