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काल रूपी नाग भी सिखाता जीना

Hardoi

Updated Wed, 25 Jul 2012 12:00 PM IST
हरदोई। हिंदू महीना सावन कालों के काल महाकाल यानी भगवान शिव की भक्ति का शुभ काल है। इसमें नाग पंचमी के रूप में नाग पूजा का भी विशेष दिन नियत है। नाग पंचमी पर मानव जाति को महाकाल का रूप कहे जाने वाले नाग से भी कुछ न कुछ सीख लेने की बात कहीं गई। जानकारों ने कहा कि क्रूर कहे जाने के बाद भी सर्प जाति बुराई में भी अच्छाई ढूंढ निकालती है।
जानकारों की माने तो सर्प के स्वभाव, व्यवहार में भी ऐसी खूबियां हैं, जिन्हें इंसानी जीवन को बेहतर तरीके से साधा जा सकता है। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉक्टर श्रीकृष्ण ने बताया कि नाग को क्रूर इसलिए कहा जाता है कि उसके एक बार ही काटने से पीड़ित कुछ ही पलों में दम तोड़ देता है, पर इसके पीछे सर्प जाति का उद्देश्य कहीं न कहीं दूसरों को मृत्यु प्रदान करना नहीं, बल्कि अपनी रक्षा को डसना है। उसमें सबसे अच्छी खासियत यही है कि वह स्वयं अपने आप को एकांत में अपने समुदाय के ही साथ रहना पसंद करता है। अगर कहीं अपने बिलों से बाहर निकलता भी हैं तो मानव की गंध सूंघ कर वह वापस लौट जाता है।
यानी सीख यह देता है कि जहां खतरा हो सकता है या वह भी किसी को खतरा पैदा कर सकता है तो वह ऐसा मौका ही नहीं आने देता और वापस हो जाता है। इसके अलावा पुराने समय से वह अपने आराध्य के साथ ही जुड़ा हुआ है। शिव के गले का आभूषण कहे जाने वाले नाग आज भी कई शिवलिंग हैं, जिनमें अपने आराध्य शिव का पूजन व चरण वंदन करने जाते हैं। उधर, जहरीले सांप की एक बूंद भी व्यक्ति की मौत का सबब बन सकती है, लेकिन अपनी यह विशेषता जानने के बाद भी सर्प अपने आप मानव जाति के बीच आकर उनके जीवन को खतरा पैदा नहीं करता।
उसके डसने के पीछे कई कारण होते हैं, जिनसे वह डसता है। बहरहाल चार दाढ़ों वाले सांप में यमदूत दाढ़ से काटा गया व्यक्ति सीधे मर जाता है। उन्मादी सांप भी किसी को डस सकता है। सांप के भूखे रहने पर भी यह स्थितियां देखी जा सकती है। बताया गया कि सांप की चार दाढे़ होती हैं, इनमें मकरी, कराली, कालरात्री एवं यमदूती दाढ़ शामिल है। सर्प जाति के लिए एक बात यह भी कही गई कि नदी का नाम लेते ही सांप भाग जाते हैं। सुनील शास्त्री का कहना है कि नाग जाति आत्मरक्षा को आक्रामक होकर अन्य जीवों के लिए प्राणघातक हो जाता है। विष्णु पुराण में कहा गया कि शिव की पुत्री नर्मदा को माना गया है और सर्प शिव के आभूषण है, जिसके बाद नर्मदा का नाम आते ही वह वहां का स्थान छोड़ देते हैं।
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