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जनता के फैसले में संदेश भी

Hardoi

Updated Mon, 09 Jul 2012 12:00 PM IST
हरदोई। निकाय चुनाव पूरी तरह से निपट चुका है। वोटों की गिनती हो चुकी है, तो नतीजे आने के बाद जीत का सेहरा भी प्रत्याशियों के सिर बांधा जा चुका है। अब परिणामों के आने बाद पार्टियां क्या खोया क्या पाया इसको लेकर गणित लगाने का क्रम शुरू कर दिया गया है।
जनता की मंशा जानने के बाद पार्टियां भले ही कुछ भी मंथन कर रही हों, पर लोगों के बीच इस बात को लेकर चर्चा है कि आखिर वोटों की बयार विकास के नाम पर एक ही तरफ बही या फिर सख्शियत के नाम पर...। निकाय चुनाव में यदि सिर्फ हरदोई पालिका की बात करें तो पता लगता है कि पालिकाध्यक्ष पद के लिए मुद्दों का अता पता नहीं था। फौरी तौर पर विकास कराने के नाम पर वोट मांगे गए। कांग्रेस, भाजपा व सपा समर्थित प्रत्याशियों की तरह ही निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी वोटरों से विकास का वादा किया, पर मतगणना के नतीजे देखे तो केंद्र में सिक्का जमाने वाली पार्टियों का वजूद ही सिमटता दिखाई दिया, तो वोटों की बयार एक तरफ ही झुकती चली गई।
वोटों के कम होनेे के पीछे पार्टियां तो कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं रहीं, पर परिणामों के बाद पड़े वोट को लेकर मंथन शुरू हो गया है। लोगों का कहना है कि जब विकास के मुद्दे तो किसी में नहीं थे तो वोट जाहिर है कि व्यक्ति विशेष के नाम पर दिया गया, पर सोचने की बात यह है कि भाजपा व कांग्रेस जैसी पार्टियों ने शहर में प्रत्याशी उतार कर खानापूरी की या उन्हे कड़ी शिकस्त ही मिली। शहरवासियों का कहना है कि निकाय चुनाव में विकास के नाम पर वोट कहीं भी नहीं पड़ा है। हरदोई पालिका की बात करें तो सख्शियत यानी सांसद नरेश अग्रवाल के नाम पर वोटर का झुकाव एक ही तरफ हुआ है। इतना तय है कि विकास व मुद्दों से कोसों दूर रहकर शहर की जनता एक बार फिर से पार्टियों के जिम्मेदारों को कुछ सोचने पर मजबूर कर गई है।
पालिका हरदोई में मीना अग्रवाल को 28 हजार 372, सुधा मिश्रा को 6065, बीना सिंह को 4096, ऊषा वर्मा को 3770 एवं सुमन गुप्ता को 1419 वोटों से ही संतोष करना पड़ गया। उधर, भाजपा, कांग्रेस प्रत्याशी को जितने भी वोट मिले यह कहा जा सकता कि वह उनके अपने निजी व्यवहार या फिर पार्टी के थे, पर उनके इर्द गिर्द रहने वालों की संख्या कुछ ज्यादा ही थी। खास बात यह रही कि ऊषा वर्मा का उदाहरण लेने पर देखा जाए तो सपा के फ्रंटल संगठनों के आश्वासनों पर ही जीतू वर्मा द्वारा बैठक कर अपनी मां का नामांकन कराया गया था, पर शायद उनको भी अपनों ने ही धोखा दे दिया।
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