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मोबाइल से रातोंरात चुनाव हो रहे टर्न

Hardoi

Updated Tue, 19 Jun 2012 12:00 PM IST
हरदोई। जेब या हाथ में टिका छोटा सा मोबाइल क्या रातोेंरात गुपचुप तरीके से किसी का चुनाव पलट सकता है या फिर मोबाइलों पर संदेश भेजकर विरोध करने वाली बड़ी लाबी को भी पक्ष में बिना मिले ही किया जा सकता है। पुराने दौर की चुनावी संस्कृति ने या तो टर्न ले लिया या फिर आधुनिकता की दौड़ लगाने को मजबूर करने वाला मोबाइल इस संस्कृति की राह में रोड़ा बन गया है। दावेदारों का मोबाइल ही सच्चा व्यवस्थापक बना हुआ है।
राजनीति में पुराने समय से रमे चले आ रहे कई बुजुर्गों का कहना है कि संचार क्रांति पिछले कुछ समय लोगों की जीवन में कुछ ऐसी आई कि हर शख्स उसी में रमता चला गया। चुनावी संस्कृति को भी इस क्रांति ने नहीं बख्शा है। उनका कहना है कि किसी जमाने में निकाय चुनावों में पार्टियाें के साथ कार्यालय भीड़ भाड़ से गुलजार रहते थे। इन्हीं समर्थकों के बीच रणनीति पर मंथन के साथ चुनावी चर्चाएं होती रहती थी, पर अब सब गायब सा हो गया है। पार्टी या प्रत्याशियों के कार्यालयों को देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता कि अब या तो दावेदार चुनावों से मतलब ही नहीं रख रहे या फिर अकेले अपनों के साथ बैठ कर कोई और रणनीति बना रहे हैं।
लोगाें का कहना है कि अब अकेले बैठकर सारे काम मोबाइलों पर ही हो रहे हैं। प्रत्याशियों के सूत्रों की माने तो वोटरों के वोट की मतदाता सूची के साथ ही मुखिया के मोबाइल नंबरों को भी जुटाया गया है तथा उनसे दिन रात संपर्क किया जा रहा है। हर वक्त काम के वक्त उनके घर के सामने खड़े रहने की कसमें खाई जा रही है। सारी रणनीति अपनों के बीच मोबाइल पर ही बन रही है। निर्देशों को देने का क्रम भी मोबाइल पर ही हो रहा है। बुजुर्गों का कहना है कि निकाय चुनाव का प्रचार जब जोरों पर चलना चाहिए तब प्रत्याशियों व राजनीतिक दफ्तरों में सन्नाटा सा छाया रहता है।
इंसेट---
कार्यकर्ताओं की निष्ठा में हो रहा ह्रास
हरदोई। मोबाइल का बढ़ता प्रयोग दावेदारों के लिए निश्चित रूप से लाभप्रद है। उनके समय से लेकर उनके रुपयों की भी बचत करता है, पर नुकसान यह भी है कि नेताओं के साथ रहने में जो निष्ठा कार्यकर्ताओं में पनपती है वह नहीं पनप पा रही। यदि यह कहें कि निष्ठा में ह्रास लगातार होता जा रहा, तो गलत न होगा।
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