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‘कालमेघ’ से मालामाल होगा ‘कलुआ’

Hardoi

Updated Wed, 16 May 2012 12:00 PM IST
हरदोई। पारंपरिक खेती मौजूदा समय में किसानों को उतना लाभ नहीं दे पाती, जितना किसान उपज से पहले लगा चुका होता है, इसलिए किसानों को अब कालमेघ या महातीता जैसी औषधीय खेती करनी चाहिए, ताकि आर्थिक रूप से वह सुदृढ़ हो सकें। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि जरा सी समझ से इस औषधि से काफी लाभ उठाया जा सकता है।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि कालमेघ को कल्पनाथ, देसी चिरायता, महातीता आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका स्वाद तीखा और पेड़ नीम से मिलता जुलता है, इसलिए इसे भूमि नीम के नाम से भी जानते हैं। कालमेघ का प्रयोग परंपरागत रूप से बलवर्धक, पेट में गैस रोकने, निमोनिया, ज्वर, यकृत, मलेरिया और कालरा आदि रोगों के इलाज में किया जाता है। यह एक वर्षीय शाकीय सीधा पौधा है, जिसकी ऊंचाई 30 से 75 सेमी तक होती है। वैज्ञानिक डा. मुकेश का कहना है कि यह कई प्रकार की चिकनी से बलुई मिट्टी में लगाया जा सकता है। कार्बनिक पदार्थ की अधिकता वाली बलुई दोमट मृदा जिसका पीएच पांच से आठ के बीच हो में इसकी खेती अच्छी होती है। पानी भरने वाले स्थानों में खेती नहीं करना चाहिए।
आर्द्र जलवायु के साथ अच्छी तरह वितरित वर्षा इसकी खेती को उपयुक्त है। कालमेघ की पौध बीज और कटिंग दोनों द्वारा तैयार की जा सकती है। बीज को सीधे खेत मेें बोया जा सकता है। इसे मई-जून में नर्सरी में पौध तैयार कर रोपित भी किया जाता है। 400 ग्राम बीज एक हेक्टेयर खेत की रोपाई को पर्याप्त है। पालीथिन बैग में पौध तैयार करने को पालीथिन बैग में मिट्टी, बालू तथा कार्बनिक खाद को एक-एक के अनुपात में मिलाकर भर देते हैं तथा बीज बो देते हैं। नर्सरी में पौध तैयार करने को क्यारी बना उसमें गोबर की खाद मिलाकर पांच सेेमी की दूरी पर बनी लाइन में बीजों की बुआई करते हैं। डा. मुकेश का कहना है कि क्यारी व पालीथिन बैग की प्रतिदिन सिंचाई करते रहना चाहिए।
कालमेघ की पौध 45 से 50 दिनों में खेत में रोपित करने को तैयार हो जाती है। कालमेघ को सीधे खेत में बोने को 30 सेेमी की दूरी पर नाली बनाकर 15 सेमी की दूरी पर तीन से चार बीज बोते हैं। पौधे की रोपाई 30-40 सेमी कतार से कतार एवं पौध से पौध 15-25 सेमी की दूरी पर करते हैं। कृषि वैज्ञानिक का कहना है कि बरसात न होने पर शुरुआती अवस्था में तीन से चार दिन के अंतराल पर सिंचाई तथा बाद में मौसम के अनुसार या एक-एक हफ्ते के अंतराल पर सिंचाई करना चाहिए। 50-े60 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। इसके संपूर्ण पौधे से लगभग 20-25 कुंतल प्रति हेक्टेयर शुष्क भार प्राप्त होता है।
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