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पानी बचाती है टपक सिंचाई पद्धति

Hardoi

Updated Mon, 08 Oct 2012 12:00 PM IST
हरदोई। कृषि क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि टपक सिंचाई पद्धति अपनाने से पानी की काफी बचत की जा सकती और बढ़ते भूजल दोहन से पैदा हो रहे खतरों को कम किया जा सकता है, पर किसानों का जागरूक होना जरूरी है। इस पद्धति से जहां पानी का दोहन कम होता है, वहीं पौधों की जड़ों तक सीधे पहुंच जाता है, जिससे फसलों की भरपूर सिंचाई हो जाती है।
ज्ञात हो कि करीब दो वर्ष पूर्व इस पद्धति को प्रचलित करने को केंद्र सरकार द्वारा काफी प्रयास किए गए थे और इस पद्धति के जरूरी उपकरणों आदि को लेकर अनुदान आदि की भी व्यवस्था की गई थी, ताकि किसान अपनाएं और फसलों की सिंचाई को भूजल दोहन कम से कम किया जा सके। इस बाबत उद्यान निरीक्षक हरिओम बताते हैं कि टपक सिंचाई पद्धति में खेतों में पाइप लाइन बिछाई जाती है और पाइप लाइन को ट्यूबवेल के हौज से कनेक्ट कर पानी आपूर्ति की जाती हैं। इसके साथ ही खेत में बिछाई जाने वाली प्लास्टिक अथवा रबड की पाइप लाइन में हर पौधे के पास वाटर प्वाइंट बनाया जाता है, जिससे पानी सीधे पौधों तक पहुंचता हैं।इस पद्धति से सिंचाई से फसलों को भरपूर पानी जड़ों तक मिलने के साथ पानी की खपत काफी होती है और पानी बहकर बर्बाद नहीं होता है। टपक पद्धति में पाइप लाइन आदि सामग्री में फसल के प्रकार के अनुसार 15 से 25 हजार प्रति हेक्टेयर का खर्च आता है और एक बार इसे खेतों में सेट करने के बाद कई वर्षों तक यह काम करती है, पर पाइप लाइन को क्षतिग्रस्त होने से बचाने को खेतों की अगली फसल को जुताई करने से पहले इस लाइन को हटा लेना चाहिए और फिर पहले की तरह बिछा देना चाहिए। बागवानी, सब्जियां और फूलों की खेती करने वाले किसानों के लिए यह पद्धति उपयोगी है। उन्होंने कहा कि इस ओर जिले के किसानों को जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा। माना कि टपक सिंचाई पद्धति के महंगे उपकरण एवं इनकी अनुपलब्धता के साथ ही ट्यूबवेलों की कमी से यह पद्धति फिलहाल यहां लोकप्रिय नहीं हो पा रही, पर इसके प्रति किसानों का जागरूक होना जरूरी है, क्योंकि इसके जरिए भूजल दोहन को कम करने में मदद मिलती है।
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