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गंगा में शिकारियों के निशाने पर डॉल्फिन

Hapur

Updated Thu, 13 Dec 2012 05:30 AM IST
गढ़मुक्तेश्वर। गंगा नदी में तेजी से बढ़ रहे प्रदूषण और बेखौफ शिकारियों के आतंक से मानवमित्र डॉल्फिन के अस्तित्व को खतरा बढ़ता जा रहा है। जन्म से ही नेत्रहीन और स्तनधारी डॉल्फिन मस्तिष्क से निकलने वाली सोनार किरणों के सहारे पानी में विचरण करती हैं। ब्रजघाट के आस-पास गंगा मेें रात के अंधेरे में नाव में बैठकर खुलेआम मछलियों का शिकार किया जाता है। छोटी मछलियों के लिए डाले गए जाल और कांटे में फंसकर डॉल्फिन को भी खतरा हो सकता है। सम्भवत: अब तक मरी डॉल्फिन भी कहीं इसका ही कारण न हो। लोगों ने कई बार शिकायत की परंतु पुलिस प्रशासन की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है। हालांकि डिप्टी रेंजर अशोक चौधरी कहते हैं कि कई बार शिकारी पकड़े गए। उनके विरुद्ध कार्रवाई भी हुई। डीएफओ जीके अग्रवाल का कहना है कि शिकारियों की सूचना मिलते ही कार्रवाई होगी।
चार साल में 4 की मौत
पांच साल में बिजनौर से लेकर नरौरा तक गंगा नदी में डॉल्फिन की संख्या 45 से बढ़कर 55 तक गई है। लेकिन संरक्षण की उचित व्यवस्था न होने से तीन साल के भीतर गढ़ के पूठ और बुलंदशहर के नरौरा में चार डॉल्फिन की मौत हो चुकी है।

सरकारी दावे खोखले
तीन वर्ष पूर्व तत्कालीन सीडीओ जुहैर बिन सगीर ने डॉल्फिन संरक्षण के लिए गंगा किनारे बसे गांव-कस्बों में डॉल्फिन मित्र नियुक्त करने की घोषणा की थी लेकिन उनका तबादला होते ही यह योजना दम तोड़ गई।
चल रहे हैं कई अभियान : डॉल्फिन के अस्तित्व को बचाने के लिए काफी समय से विश्व स्तर पर कई संगठनों द्वारा अभियान चलाए जा रहे हैं। भारत में गंगा और उसकी सहायक नदी, पाकिस्तान में सिंधू, साउथ अफ्रीका में अमेजन नदी में पाई जाने वाली डॉल्फिन का अस्तित्व बचाने को डब्ल्यूडब्ल्यूएफ संस्था कार्य कर रही है।

डॉल्फिन पंचायत लगेंगी
भारत और पाकिस्तान में काम कर रही सेवियर संस्था की स्वाति शर्मा बताती हैं कि जल्द ही डॉल्फिन पंचायत अभियान चालू होगा। इसके तहत एक माह तक हस्तिनापुर से लेकर नरौरा तक गंगा किनारे गांव-कस्बों में पंचायत लगाकर लोगों को जागरूक किया जाएगा।

जिम्मेदारी कैसे होगी पूरी, नाव तक नहीं
डिप्टी रेंजर अशोक चौधरी कहते हैं कि वन विभाग पर भी डॉल्फिन के संरक्षण की जिम्मेदारी है, परंतु नाव की कोई व्यवस्था न होने से इसमें मुश्किल आ रही है।

पर्यावरणविद् का कथन
प्रो. अब्बास अली का कहना है कि पानी की गहराई और चौड़ाई अपेक्षित होना बेहद जरूरी है, क्योंकि चौड़ाई कम होने से विचरण सही ढंग में नहीं हो पाता है। वहीं, गहराई कम होने से अंडे बर्बाद होने का खतरा रहता है।
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