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हिंदु-मुस्लिम एकता का प्रतीक है गुदरियाबाबा सैंरो का मेला

Hamirpur

Updated Mon, 24 Dec 2012 05:30 AM IST
रामविमल त्रिवेदी
मुस्करा (हमीरपुर)। कसबे का ऐतिहासिक गुदरिया बाबा सैंरो का मेला हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक है। रविवार को मेले का मुख्य आकर्षण कोतवाली नाम से प्रसिद्ध एक वर्ग के जुलूस ने कसबे का भ्रमण किया। जबकि रहमत अल्लाह भी गुदरिया बाबा के मेला मेें आते रहे हैं। मेला 30 दिसंबर तक चलेगा।
कसबे का गुदरिया बाबा मेल करीब 554 वर्ष से अधिक पुराना है। प्राचीन परंपराओं के साथ यह अगहन सुदी छठ से खेल तमाशों के साथ शुरू होता है। छठ को नट बिड़िया निकलते है। कसबे के वयोवृद्ध पंडित चंद्रशेखर दीक्षित बताते है कि कोरी समुदाय के लोग बागों में आए बगैचा में आए नामक गीत गाकर जुलूस की शक्ल में कसबे के रास्ते में निकलते है। जो श्रीराम के बनवास की झांकी के रुप को दर्शाते है। जबकि दूसरे दिन चोर निकलते है जो सीताहरण का प्रतीक है। तीसरे दिन दीवारी होती है तो चौथे दिन धुबयायी होती है जो धोबी द्वारा अपनी पत्नी को डंाटकर सीता पर रावण के यहां रहने पर दोष प्रकट करता है। फिर पांचवें दिन पमारो निकलता है जो लक्ष्मण संवाद व मिथला का आमोद-प्रामोद है। छठवें दिन मुख्य कार्यक्रम कोतवाली होती है। इसमें बनरा, नागा, काली, बहकटा आदि तमाशे निकलते है। जो राम व रावण के अलग अलग दल का प्रतीक है। अंत में सातवें दिन गुदरिया बाबा के स्थान पर राम रावण व अंगद संवाद होने के साथ रावण का बध होता है। इन सभी पात्रों की प्राचीन भेषभूषा होती है। कसबे के दूसरे बुजुर्ग बद्रीप्रसाद द्विवेदी बताते है कि मेले के सभी खेल तमाशे रामलीला की टूटी फूटी नकल है। जो अब विकृत होती है। जबकि इसके पूर्व शुद्ध रामलीला होती थी। जिसमें ब्राह्मण ही रामलीला का मंचन करते थे। कहते है कि एक बार बसवारी गांव से रावण का पाठ करने वाला पात्र मुस्करा के बाहर गांव आ गया जिसे मार डाला गया। तबसे ब्राह्मणों ने मंचन छोड़ दिया। वहीं कोरी व अन्य समुदाय के लोग यह लीला करने लगे। बताया कि बसवारी में यही कार्यक्रम कोतवाली व दंगल का आयोजन एक दिन पूर्व होता है जो इस बात को दर्शाता है।
गांव के वयोवृद्ध मैयादीन शुक्ल बताते है कि यह मेला मुकुंदलाल गुदरिया बाबा (अघोरी) जिसे तैमोगर जूती भी कहते है। वह इसी क्षेत्र में ही निवास कहते थे। बसवारी मसगांव के बीच पतौउवा के ऊजर मौजे में है। इन्हीं मुकुंदलाल ने अपने गुरु की याद में शुरु किया था। जिंदाशाह बदरुद्दीन रहमत अल्लाह की यादगार में आज भी मकनपुर कानपुर देहात में लगता है। उस मेला में मुकुंदलाल व हिरिया साध्वी भी जाया करते थे। जबकि रहमत अल्लाह भी गुदरिया बाबा के मेला मेें आते थे। बुजुर्गों ने बताया कि मकनपुर का मेला भी इतना ही पुराना है। पवारे (बहादुरी) कार्यक्रम में मुस्लिम समुदाय शेखमंसूरी लोग मुगल बादशाहो का गुणगान प्रकट करते है। इसी के चलते इस मेले को हिन्दु मुस्लिम एकता का प्रतीक कहा जाता है।
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