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आज चढ़ेगी गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी

अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।

Updated Sat, 14 Jan 2017 12:49 AM IST
Makar sankranti will celeberate today

गुरु गोरक्षनाथ।

मकर संक्रांति पर्व आज है। इस दिन देश भर के श्रद्धालु गोरखनाथ मंदिर में गुरु गोरखनाथ को आस्था की खिचड़ी चढ़ाएंगे। एक दिन पहले ही दूरदराज से आस्थावान गोरखपुर पहुंचने लगे। सुबह चार बजे सबसे पहले पूजा करने के बाद पीठाधीश्वर खिचड़ी चढ़ाएंगे। इसके दस मिनट बाद मंदिर का कपाट आम भक्तों के लिए खोल दिया जाएगा। इस दिन से एक माह तक चलने वाले खिचड़ी मेले का भी शुभारंभ हो जाएगा।
गोरखनाथ मंदिर में मेले के चलते होने वाली भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा, लाइट, पानी, साफ-सफाई की मुकम्मल व्यवस्था की है। मंदिर प्रबंधन भी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर खासा चौकस है। शुक्रवार को सभी तैयारियां पूरी कर ली गई। सड़क किनारे पंडाल लगाए गए हैं, जहां श्रद्धालुओं के सामान रखने की व्यवस्था की गई है। मंदिर परिसर में गुरु गोरखनाथ एवं जिला चिकित्सालय की तरफ से कैंप लगाया गया है। डाक्टरों की भी तैनाती की गई है। मेलार्थियों का सहयोग करने के लिए नागरिक सुरक्षा कोर ने भी कैंप लगाया है। शुक्रवार को पीठाधीश्वर महंत आदित्यनाथ ने मेले की व्यवस्था का जायजा लिया। 

रेडियो पर खिचड़ी मेले का सीधा प्रसारण
मकर संक्रांति पर गोरखनाथ मंदिर से खिचड़ी मेले का सीधा प्रसारण आकाशवाणी से किया जाएगा। यह प्रसारण सुबह 7:30 से 10:30 बजे तक किया जाएगा।
यह जानकारी आकाशवाणी गोरखपुर के कार्यक्रम प्रमुख डॉ. अरविंदराम त्रिपाठी ने दी। उन्होंने बताया कि आकाशवाणी के सभी कार्यक्रमों में मकर संक्रांति पर्व की परंपरा और गुरु गोरखनाथ पर वार्ता और चर्चा प्रसारित की जाएगी। दूसरी तरफ संगीत का कार्यक्रम सुबह 6:05 बजे प्रसारित होगा। आकाशवाणी के एफएम चैनल, विविध भारती पर शाम 5:30 बजे मकरसंक्रांति पर एक विशेष रिपोर्ट प्रसारित की जाएगी। मेले का आंखों देखा हाल बारी-बारी से प्रशिक्षित कमेंटेटर बताएंगे।

मकर संक्रांति को लेकर बैठक हुई
आर्य समाज यज्ञशाला मोहद्दीपुर में शनिवार को मकर संक्रांति को लेकर बैठक हुई। आर्य समाज प्रांगण में यज्ञ आहुति देने के बाद भजना संध्या कार्यक्रम का आयोजन करने का निर्णय लिया गया। कलावती देवी व अनीता वर्मा भजनों की प्रस्तुति देंगी। उसके बाद मकर संक्रांति के इतिहास पर बुद्धिजीवी मोहनलाल वर्मा, हृदयानंद व विनय प्राणाचार्य अपने विचार रखेंगे। बैठक में देवेंद्र सर्राफ, लखन वर्मा, उत्तम कुमार वर्मा, अमरनाथ, महावीर अग्रवाल, बैजनाथ सिंह, महात्मा आर्य, रामप्रसाद विश्वकर्मा आदि मौजूद थे।

त्रेता से है गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा

जगतगुरु गोरक्षनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा सालों नहीं बल्कि दो युग  पुरानी है। भगवान सूर्य के प्रति आस्था से जुड़े मकर संक्रांति पर खिचड़ी चढ़ाने का इतिहास त्रेता युग का है। इस परंपरा का निर्वहन आज भी उसी आस्था व श्रद्धा के साथ किया जा रहा है। मान्यता है कि त्रेता युग में गुरु गोरक्षनाथ भिक्षा मांगते हुए हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के ज्वाला देवी मंदिर गए। सिद्ध योगी को देख देवी साक्षात प्रकट हो गई और गुरु को भोजन का आमंत्रण दिया। जब गुरु पहुंचे तो वहां मौजूद तरह-तरह के व्यंजन देख ग्रहण करने से इनकार कर दिया और भिक्षा में मिले चावल-दाल ही ग्रहण करने की बात कही।

देवी ने गुरु की इच्छा का सम्मान किया और कहा कि आप के द्वारा लाए गए चावल-दाल से ही भोजन कराऊंगी। वहां से गुरु भिक्षा मांगते हुए गोरखपुर चले आए। यहां उन्होंने राप्ती व रोहिणी नदी के संगम पर एक स्थान का चयन कर अपना अक्षय पात्र रख दिया और साधना में लीन हो गए। उसी दौरान जब खिचड़ी का त्योहार आया तो लोगों ने एक योगी का भिक्षा पात्र देखा तो उसमें चावल-दाल डालने लगे। जब काफी मात्रा में अन्न डालने के बाद भी पात्र नहीं भरा तो तो लोगों ने इसे योगी का चमत्कार माना और उनके सामने श्रद्धा से सिर झुकाने लगे। तभी से गुरु के इस तपोस्थली पर खिचड़ी पर चावल-दाल चढ़ाने की जो परंपरा शुरू हुई, वह आज तक उसी आस्था व श्रद्धा के साथ चल रही है। 

शुभ कार्यों के लिए सर्वोत्तम है मकर संक्रांति 
ज्योतिषाचार्य शरद चंद मिश्र ने अनुसार सूर्य वर्ष भर सभी 12 राशियों में संक्रमण करता रहता है। जब यह धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है तो मकर संक्रांति का पुण्यकाल आता है। इस काल को शुभ कार्यों के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इसकी शुभता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भीष्म पितामह ने अपनी इच्छा मृत्यु के लिए इस काल की प्रतिक्षा की थी। मकर संक्रांति के दिन दाल-चावल और काले तिल का दान पुण्यदायी माना जाता है।

नेपाल राज परिवार की चढ़ती है पहली खिचड़ी
मंदिर में इस अवसर पर नेपाल राज परिवार की ओर से भी खिचड़ी चढ़ाई जाती है। इसके पीछे का इतिहास नेपाल के एकीकरण से जुड़ा है। आचार्य डॉ. रोहित के अनुसार नेपाल के राजा के राजमहल के समीप ही गुरु गोरक्षनाथ की गुफा थी। उस समय के राजा ने अपने बेटे राजकुमार पृथ्वी नारायण शाह से कहा कि यदि कभी गुफा में गए तो वहां के योगी जो भी मांगे, उसे मना मत करना। जिज्ञासावश शाह खेलते हुए वहां पहुंच गए और गुरु ने उनसे दही मांग दी। राजकुमार अपने माता-पिता संग दही लेकर जब गुरु के पास पहुंचे तो उन्होंने दही का आचमन कर युवराज के अंजुली में उल्टी कर दी और उसे पीने को कहा। युवराज की अंजुली की दही पैरों पर गिर गई। लेकिन बालक को निर्दोष मानकर नेपाल के एकीकरण का वरदान गुरु ने दे दिया। बाद में इसी राजकुमार ने नेपाल का एकीकरण किया। तभी से नेपाल नरेश व वहां के लोगों के लिए गुरु गोरक्षनाथ आराध्य देव हैं।

 
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