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दोधारी तलवार हो रही है हाइब्रिड खेती

Gorakhpur

Updated Mon, 24 Dec 2012 05:30 AM IST

गोरखपुर। गांव गांव घूमकर हाइब्रिड सीड (संकर बीज) बेच रहे एजेंटों के लिए यह मुनाफे का धंधा हो सकता है मगर इसके बढ़ते प्रसार ने परंपरागत खेती के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है। गोरखपुर बस्ती मंडल में ही 1,92211 हेक्टेयर है जबकि सूबे में 10लाख हेक्टेयर से ज्यादा।
आर्गेनिक खेती के नाम पर परंपरागत खेती की वापसी पर लगातार जोर दिया जा रहा है। ऐसे में संकर बीजों के प्रति आग्रह हैरत में डालता है। हाइब्रिड खेती एक ऐसा भस्मासुर है जिससे हमारी जैवविविधता को खतरा है। साल दर साल हम इसका क्षेत्र बढ़ा रहे हैं और परंपरागत बीजों की ‘पैरेंटल लाइन’ को नष्ट करते जा रहे हैं। इसके कारण प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्में विकसित करने में समस्याएं आ रही हैं। दरअसल हाइब्रिड की जितनी किस्में विकसित हो रही हैं उनमें 90 फीसदी ऐसी हैं जिनमें एक पैरेंट कामन है। अनाज में धान के हाइब्रिड का क्षेत्र दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। जिस धान की कीमत बमुश्किल 1000 रुपये कुंटल मिल रही है उसके 200 रुपये किलो बीज खरीद कर किसान बुआई कर रहे हैं। हाइब्रिड कंपनियों के एजेंट गांव गांव घूमकर इसकी तिलिस्मी पैदावार बताकर उन्हें आकर्षित कर रहे हैं। जहां पैदावार बेहतर हो जा रही है वहां दुबारा श्रेय लेने और नए किसानों को प्रेरित करने के लिए होड़ लग रही है पर जहां बीज जमते नहीं वहां दुबारा नहीं जाते। चौरीचौरा के विश्वनाथपुर गांव के जगदीश निषाद का तो यही तजुर्बा है। उन्होंने 300 रुपये किलो धान का बीज खरीदा था और धान फूटा ही नहीं।
सब्जी उत्पादक सुरेंद्र कहते हैं हाइब्रिड मजबूरी है। देशी की अच्छी किस्में निकाली जाएं तो हाइब्रिड कोई नहीं बोएगा। बाजार में भी जो अच्छे ग्राहक हैं वे देशी की ही मांग करते हैं। कीमत भी देशी की अधिक मिलती है पर जनवरी से मार्च तक गोभी बेचनी है तो देशी नहीं हाइब्रिड ही चलेगी।
नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय में हाइब्रिड विशेषज्ञ जेएन द्विवेदी का कहना है कि हाइब्रिड आज की जरूरत है पर एक सीमा से अधिक इसका क्षेत्र नहीं बढ़ना चाहिए। इसमें संसाधन की ज्यादा जरूरत पड़ रही है। हाइब्रिड में जो पैरेंट लाइन प्रयोग होती है उनमें 90 फीसदी के एक ही पैरेंट हैं। इसमें जोखिम यह है कि जिस रोग के लिए जिस प्रजाति में जो प्रतिरोधी गुण हैं अगर किसी कारण से उनकी प्रतिरोध क्षमता खत्म हुई को एक साथ पूरा एरिया बरबाद हो जाएगा। इसीलिए हमें समूचे कृषि क्षेत्र में हाइब्रिड का सपना नहीं देखना चाहिए। टर्मिनेटर जीन से बीटी काटन के दुष्परिणाम हम देख चुके हैं। नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय के ही कृषि विज्ञानी पद्माकर त्रिपाठी का कहना है कि पैरेंट लाइन खत्म होने से प्रतिरोधी किस्में विकसित करने में दिक्कत आ रही है। ‘जीन प्लाज्म’ के संग्रह में भी संकट है। मिसाल के तौर पर अगर हम कोई ऐसी किस्म विकसित करना चाह रहे हैं जो सूखाग्रस्त क्षेत्र के लिए मुफीद हो तो जब तक उसकी ‘पैरेंटल लाइन’ नहीं मिलेगी ऐसा संभव नहीं होगा। ‘नगीना 22’ ‘ड्राट सालवेंट’ है पर पर इसकी पैरेंटल लाइन न मिलने से सूखाग्रस्त क्षेत्रों में होने वाली किस्में विकसित नहीं हो पा रही हैं। रोग सालवेंट, ड्राट साल्वेंट के लिए पैरेंट लाइन जरूरी है।

हाइब्रिड में गच्चा खा गए दर्जन भर किसान
चौरीचौरा क्षेत्र के करीब एक दर्जन किसान हाइब्रिड धान की खेती कर भारी नुकसान उठा चुके हैं। मुंडेरा बाजार क्षेत्र के किसान मुन्ना ने 10 कट्ठा खेत में हाइब्रिड धान लगाया था। पौधों की बढ़वार तो काफी हुई लेकिन उनमें बालें ही नहीं निकलीं। खाद, बीज और सिंचाई लेकर उन्होंने 3000 रुपये खर्च किए। यही हाल इस क्षेत्र के रकबा गांव के किसानों का हुआ। राजबहादुर विश्वकर्मा, रामचंद्र, बहादुर समेत दसियों किसानों ने हाइब्रिड धान लगाया लेकिन सब धोखा खा गए। ग्राम लक्ष्मनपुर के पूर्व प्रधान गनपत चौहान ने बताया कि खेत में धान लहलहाने के बाद भी पैदावार बमुश्किल 10 फीसदी ही मिल पाई।

हाइब्रिड किसानों के लिए अहितकर
झंगहा के किसान शिव बचन का कहना है कि देशी बीजों का कोई जवाब नहीं। हाइब्रिड में रोग अधिक लग रहे हैं और लागत भी अधिक लग रही है। स्वाद बेमजा है। स्वास्थ्य पर नुकसान क्या हो रहा है यह लंबे समय बाद पता चलेगा। हम हाइब्रिड की सलाह कभी नहीं देंगे। देशी खाद देशी बीज और देशी कीटनाशक से ही किसान और खेती दोनों का भला है।

परंपरागत बीज : इन बीजों का गुण है कि वे एक जनरेशन से दूसरे जनरेशन जाते हैं।
हाइब्रिड बीज : इस तरह के बीजों में जीन थेरेपी से उसका एक जनरेशन से दूसरे जनरेशन जाने का गुण समाप्त कर दिया जाता है। यानी इनके पैरेंट कॉमन होते हैं। एक के रोगग्रस्त होने के साथ पूरी फसल प्रभावित हो जाती है।


फैक्ट फाइल
पूर्वांचल में हाइब्रिड का क्षेत्रफल
गोरखपुर 20,000 हेक्टेयर
कुशीनगर 25000 हेक्टेयर
देवरिया 12000 हेक्टेयर
महराजगंज 30510 हेक्टेयर
बस्ती 32301 हेक्टेयर
संतकबीरनगर 25000 हेक्टेयर
सिद्धार्थनगर 47,400 हेक्टेयर
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