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‘तोड़ती पत्थर’ को श्रीराम ने दिया कुछ अलग दृष्टिकोण

Gorakhpur

Updated Mon, 24 Dec 2012 05:30 AM IST

सिटी रिपोर्टर
गोरखपुर। वरिष्ठ आलोचक व गुजरात विश्वविद्यालय के आदिवासी आर्ट्स एवं कामर्स कॉलेज के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डा. श्रीराम त्रिपाठी ने महाकवि निराला की कालजयी रचना ‘तोड़ती पत्थर’ को बिलकुल नया आयाम दिया। कविता में वीणावादिनी को मिथ को तोड़कर उन्होंने उस सरस्वती को स्थापित किया जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। सांस्कृतिक शून्यता के पत्थर को तोड़ती हुई मजदूरिन के रूप में सरस्वती को देखना कवि का एक क्रांतिकारी प्रयास है। त्रिपाठी की इस व्याख्या से विशेषज्ञों ने असहमति भी जताई और कहा कि इससे निराला की श्रमिक वर्ग के प्रति पक्षधरता पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाएगा।
रविवार को प्रेस क्लब में प्रेमचंद साहित्य संस्थान की ओर से आयोजित कार्यक्रम में निराला की कविता ‘तोड़ती पत्थर’ को डॉ. श्रीराम त्रिपाठी ने बिलकुल नए आयाम में परिभाषित किया। इस कविता में तोड़ती पत्थर त्रिवेणी की तीसरी वेणी अर्थात सरस्वती है जो अंत:करण को सरसता प्रदान करती है।
अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार एवं गोरखपुर यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अनंत मिश्र ने डा. श्रीराम त्रिपाठी की व्याख्या को श्रम साध्य बताया लेकिन उससे असहमति भी जताई। कहा कि इस नए भाष्य से निराला की श्रमिक वर्ग के प्रति पक्षधरता पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाएगा। प्रो. केसी लाल ने कहा कि डा. त्रिपाठी ने निराला की इस कविता की भिन्न संदर्भ में व्याख्या की जिसे अब तक सोचना-समझा ही नहीं गया है। पत्थर तोड़ने ़के रूपक को उस वक्त की सांस्कृतिक वीरानी को तोड़ने के तौर पर व्याख्यायित करने से भी असहमति जाहिर की। गोरखपुर यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के डॉ. कमलेश गुप्त ने कहा कि डॉ. त्रिपाठी ने इस कविता की व्याख्या करते हुए अतिशय कल्पना का सहारा लिया है। कार्यक्रम के प्रारंभ में फिल्मकार प्रदीप सुविज्ञ ने ‘तोड़ती पत्थर’ का पाठ किया।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे आलोचक कपिलदेव ने कहा डॉ. श्रीराम त्रिपाठी ने कम आलोचना लिखी है लेकिन जितनी भी लिखी है वह प्रखर व मौलिक है। उनकी आलोचना में नए किस्म का विश्लेषण है जो हमें झकझोरती है।
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