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सांस्कृतिक संकट का सीधा संबंध अमेरिकी साम्राज्यवाद से : रविभूषण

Gorakhpur

Updated Sun, 04 Nov 2012 12:00 PM IST
गोरखपुर। आज की सांस्कृतिक संकट का सीधा संबंध अमेरिकी साम्राज्यवाद और उच्छृंखल वित्तीय पूंजी से है। यह जो आवारा पूंजी है, यह लोभ-लालच, अवसरवाद और बर्बरता की संस्कृति का प्रसार कर रही है। 70 के दशक से ही अमेरिकी साम्राज्यवादी अर्थनीति ने पूरी दुनिया पर कब्जे के जिस अभियान की शुरुआत की थी उसका 90 के दशक में डंकल और नई आर्थिक नीतियों के जरिए भारत पर भी प्रभाव पड़ा। इसमें भारत के शासकवर्गीय पार्टियों की पूरी सहमति है। इस साठगांठ ने पूरे देश को बाजार में तब्दील कर दिया है। विजेंद्र अनिल सभागार गोकुल अतिथि भवन में जन संस्कृति मंच के 13 वें राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए आलोचक प्रो. रविभूषण ने ये बातें कहीं।
‘साम्राज्यवाद और समकालीन सांस्कृतिक संकट’ जसम के सम्मेलन का केंद्रीय थीम पर उद्घाटन सत्र में प्रो. रविभूषण ने कहा कि पूंजी की जो संस्कृति है, वह श्रम से निर्मित जनता की सामूहिकता की संस्कृति को नष्ट कर रही है। सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रही है। देश के प्राकृतिक संसाधनों की लूट हो रही है। ऐसे में संस्कृतकर्मियों की सामाजिक-राजनीतिक जिम्मेदार बढ़ गई है। संघर्ष, प्रतिरोध, सच और न्याय के लिए उन्हे साम्राज्यवाद और उनकी सहायक राजनीतिक शक्तियों के खिलाफ एकजुट होना पड़ेगा।
वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने तीनों वामपंथी लेखक संगठनों की एकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भाषा की मुक्ति जनमुक्ति की पहली शर्त है। प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव राजेंद्र राजन ने कहा कि लेखक संगठनों की एकता के साथ-साथ भारतीय भाषाओं की एकता की जरूरत है। उन्होंने कलम की हिफाजत को देश की हिफाजत के लिए जरूरी बताया। जनवादी लेखक संघ के प्रमोद कुमार ने अपने महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और चंचल चौहान के संदेश का पाठ किया।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि साम्राज्यवाद केवल राजनीतिक आर्थिक व्यवस्था ही नहीं एक विचार व्यवस्था भी है। वह गुलाम देशों के बुद्धिजीवियों और जनता की चेतना पर विजय पाना चाहता है। विचारधारा का अंत, इतिहास का अंत, साहित्य का अंत और सभ्यताओं का संघर्ष आदि सारे सिद्धांत अमेरिकी साम्राज्यवाद के हित में बनाए गए।
प्रो. पांडेय ने कहा कि संस्कृति हमारे लिए एक राजनीतिक प्रश्न है। जन संस्कृति तभी बचेगी, जब जन बचेगा। कला साहित्य और संस्कृति से भी ज्यादा जरूरी है जनता के सवालों पर आंदोलन खड़ा करना। पूर्वांचल के इलाके में इंसेफेलाइटिस के सवाल पर संस्कृतिकर्मियों को आंदोलन की पहल करनी चाहिए। जन आंदोलन की जरूरत है। उसी से जन संस्कृति निकलेगी और जनता के लिए हितकर साबित होगी।
सम्मेलन का स्वागत वक्तव्य देते हुए प्रो. रामदेव शुक्ल ने कहा कि संस्कृति की जो अभिजात्य परिभाषा है, उसे बदलकर उसे जनता की संस्कृति के तौर पर स्थापित करने के लिए जसम संघर्ष कर रहा है। इसी के जरिए जन की तबाही को रोका जा सकता है। उद्घाटन सत्र में तीन पुस्तकों का विमोचन किया गया। रामनिहाल गुंजन द्वारा संपादित ‘विजेंद्र अनिल होने का अर्थ’ का लोकार्पण वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह, अरविंद कुमार संपादित ‘प्रेमचंद: विविध प्रसंग’ का मैनेजर पांडेय और दीपक सिंहा के नाटक ‘कृष्ण उवाच’ का लोकार्पण प्रो. रविभूषण ने किया। सम्मेलन स्थल पर कविता पोस्टर प्रदर्शनी और बुक स्टॉल भी लगाए गए हैं।

आज के कार्यक्रम
चार नवंबर को सुबह दस बजे से सम्मेलन का सांगठनिक सत्र होगा। शाम पांच बजे से वनटांगिया लोगों के संघर्ष पर केंद्रित ‘बिटवीन द ट्रीज’ और आनंद पटवर्धन की चर्चित फिल्म ‘जय भीम कामरेड’ दिखाई जाएगी।
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