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मां का मटका ढोकर धन्ना लाल बन गए हरिहर बाबा

Gorakhpur

Updated Sun, 28 Oct 2012 12:00 PM IST
गोरखपुर। लोक कलाओं को बहुत जतन से संजोकर समूची कायनात में उसकी खुशबू बिखेर रही है राजस्थान की धरती। उसी रत्नगर्भा वसुंधरा के वरद पुत्र हैं, ‘भवई नृत्य’ के अनुपम कलाकार हरिहर बाबा। लोक कलाओं की थाती को समृद्ध और अक्षुण्ण रखने का उनका संकल्प अल्हण उम्र से ही है। स्कूल के दिनों से ही लोक कलाएं मन में ऐसी बसीं कि उसे अपनी धड़कन बना लिया। नाचना देखकर मां ने शुरू में कुछ झिझक दिखाई तो उनके पानी के मटके ढोकर उन्हें अपनी गुरु बना लिया और मां ने उन्हें कंचन बना दिया। सो धन्ना लाल हरिहर बाबा बनकर कला की दुनिया में छा गए। अमर उजाला की ओर से आयोजित ‘डांडिया धमाल’ में आए हरिहर बाबा ने अपने जीवन से जुड़े अनुभव साझा किए।
कोटा में उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक हरिहर बाबा सिर पर गिलास रखकर 61 मटकों के गुंबद बनाकर जिस तन्मयता से नृत्य करते हैं, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। कहते हैं, ‘योगेश्वर कृष्ण मेरे आराध्य हैं और मैं उनकी गोपी। इसी भाव से मेरा नृत्य होता है और लगता है साक्षात कृष्ण मेरे सामने खड़े हैं।’ यही भाव लेकर वे कांच के टुकड़ों ओर तलवार की धार पर भी ऐसे थिरकते हैं कि देखने वाले विस्मय में पड़ जाते हैं।
लोक कला की ललक के बारे में बताते हैं, ‘स्कूल में 15 अगस्त और 26 जनवरी के कार्यक्रमों में शामिल होने पर शिक्षकों से मिली शाबाशी प्रेरणा बन गई। सिर पर गिलास रखकर घर में संतुलन साधना शुरू किया। गिलास में रेत भरकर आंगन में नाचा करता था। घर वालों को नागवार लगता। कहते कि नाच भला लड़कों के लिए थोड़े है! पिता ने देखा तो मां से कहा कि इसे अपने मन की कर लेने दो। फिर तो मां ही मेरी गुरु बन गई। बावड़ी से पानी भरे मटके सिर पर रखकर लाने लगा और इतना संतुलन बना कि जिंदगी ही संवर गई। 57 साल के हो चुके बाबा में युवाओं को मात देने वाली फुर्ती है। बाबा शुद्ध शाकाहारी हैं। किसी तरह के नशे की कोई लत नहीं। काया को चुस्त रखने के लिए हर दिन आधे घंटे का नृत्य उनकी दिनचर्या में शामिल है।
हरिहर बाबा नाम उन्हें अपने गुरु दिवंगत पुरुषोत्तम लाल जी महाराज से मिला। मां पिता ने तो धन्ना लाल नाम दिया था। हरिहर नाम रखने के पीछे विष्णु और शिव के नृत्य रूप उनके मानस में थे। वे कहते ,‘तेरे नृत्य में दोनों का आनंद है इसलिए तू सच्चे अर्थों में हरिहर नाम का अधिकारी है।’ बीते 20 सालों से अपने गुरु के सपनों को न केवल साकार कर रहे हैं बल्कि लोक कला की मशाल से चारों दिशाओं को रोशन कर रहे हैं।
भवई नृत्य
राजस्थान की लोक संस्कृति से जुड़ा है भवई नृत्य। राजशाही के दौरान मंदिरों में ‘जलघड़िया’ होते थे। वे आराध्य को रिझाने के लिए सिर पर मटकी रखकर नाचा करते थे। धीरे-धीरे इस कला में उभार आया और उसे मंदिर के परकोटे से बाहर निकालकर लोकजीवन का रंग दिया गया।
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