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साधुता तो मुखौटा है, ये आदमखोर है

Gonda

Updated Tue, 18 Dec 2012 05:30 AM IST
गोंडा। ‘यह जो दरवाजे पे बुड्ढा देव अर्चन कर रहा, घाघ है इस गांव का छल से धनार्जन कर रहा, ब्याज लेकर कर रहा शोषण समझ लो चोर है, साधुता तो बस मुखौटा है ये आदमखोर है। दिखावे के लिए तो हनुमान जी का भक्त है, असली ईश्वर किंतु इसका थैलियों में व्यस्त है। पढ़ रहा गीता प्रकटत: पर है अपने दांव में, कितने घर उजड़े है इसकी साधुता की छांव में’। इन्हीं पंक्तियों के साथ जनवादी कवि रामनाथ सिंह अदम गोंडवी ने काव्य जगत में कदम रखा था। एक महात्मा को चिढ़ाने के लिए कविता पाठ करने पर अदम को पांच रुपये का पुरस्कार मिला था। इसके बाद शुरू हुई अदम की कलम आम आदमी की आवाज बन गई। उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए जनता का दर्द उजागर किया।
परसपुर के आटा गांव के रामनाथ सिंह अदम गोंडवी जब पांच साल के थे तो उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। पिता ने ही उनका पालन किया। उन्होंने गांव के प्राइमरी पाठशाला में प्राथमिक शिक्षा ली। बीमारी के कारण चाहते हुए भी आगे की शिक्षा नहीं ले सके। स्वास्थ्य लाभ के लिए वह बहराइच के जाने माने महंथ रघुनाथ दास कटका के सानिध्य में रहे। महंथ ने ही उनकी रचनाओं के आधार पर उनके कदम को मजबूत करते हुए अदम उपनाम दिया। महंथ के निजी उच्चकोटि के पुस्तकालय में स्वाध्याय करना और उनके नेत्रहीन पुत्र महंथ हरिशरण दास को सुनाना यह उनकी दिनचर्या का अंग था। स्वाध्याय और महंथ के सानिध्य ने ही अदम के मन में यह भाव पैदा किया कि वह भी कुछ लिख सकते हैं और वह लिखने लगे। सरयू नदी के तट पर भौरीगंज में वर्ष 1972 में एक कवि सम्मेलन में पहली बार अदम ने कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे महात्मा को चिढ़ाने के लिए गांव शीर्षक से काव्यपाठ किया था। जिस पर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे महात्मा ने प्रसन्न होकर अदम को पांच रुपये पुरस्कार भी दिया। इसके बाद तो अदम की लेखनी कुछ यूं चली कि उन्होंने जो देखा, उसे अपनी रचनाओं में उतार दिया।
इन सबके बीच उन्हें बहुत कुछ झेलना पड़ा। चमारों की गली कविता के जरिए सामंती उत्पीड़न एवं दलित महिला के साथ बलात्कार की घटना का जिस तरह से अदम ने चित्रण किया, उससे साहित्यिक लोगों का ध्यान अदम गोंडवी पर गया। अदम की पहली कविता नवंबर 1981 में हिन्दी दैनिक अमृत प्रभात में चमारों की गली शीर्षक से प्रकाशित हुई।
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