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मानदेय का वादा भूल गई प्रदेश सरकार

Ghazipur

Updated Tue, 27 Nov 2012 12:00 PM IST
बहरियाबाद। मान्यता प्राप्त वित्तविहीन माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों की स्थिति दिहाड़ी मजदूर से भी बदतर हो चुकी है। किसी तरह ये परिवार की गाड़ी को खींच रहे हैं। इन श्रमिक गुरुओं को समान वेतन मिलना तो दूर सम्मान भी नहीं मिल पा रहा है। इनमें से कई को तो उचित मानदेय की मांग करने पर लाठियां खानी पड़ी हैं। लगातार ध्यान आकर्षित करने के बाद भी सरकार बेपरवाह बनी है।
वित्तविहीन शिक्षक संघ के मुताबिक माध्यमिक शिक्षा का 75 प्रतिशत भार प्रदेश के चौदह हजार सोलह माध्यमिक वित्तविहीन विद्यालयों पर है। इनमें लगभग सवा दो लाख अध्यापक और 75 हजार शिक्षणेत्तर कर्मी कार्यरत हैं। प्रदेश के 580 राजकीय और 4478 अनुदानित माध्यमिक विद्यालयों पर सरकार की ओर से 33 अरब से अधिक रुपये खर्च किए जा रहे हैं जबकि वित्तविहीन शिक्षकों पर सरकार का ध्यान नहीं जा रहा है। 15 से 20 साल तक सेवा करते -करते शिक्षक अब निराश हो चुके हैं। वर्तमान में केवल गाजीपुर जनपद में 850 वित्तविहीन विद्यालय संचालित हैं।
शासन ने प्रयोग के तौर पर 14 अक्तूबर 1986 को वित्तविहीन विद्यालयों की शुरुआत की थी। तब इसे अल्पकालीन व्यवस्था कहा गया था। उस समय सरकार ने शपथ पत्र जमा कराया था कि सन् 1990 तक कोई वित्तविहीन विद्यालय अनुदान की मांग नहीं करेगा। शिक्षकों ने समझा कि तीन वर्ष बाद उनकी स्थिति भी वित्त सहायता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों जैसी हो जाएगी। लेकिन दो दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने इनकी दशा सुधारने का प्रयास किया और नियमावली तैयार करवाई। इसके तहत वित्तविहीन शिक्षकों को कारखाने में कार्य करने वाले कुशल श्रमिकों के बराबर वेतन देने का शासनादेश जारी तो कर दिया गया लेकिन इसका अनुपालन न तो शिक्षा विभाग द्वारा किया गया और न ही प्रबंधतंत्र ने किया। एक हजार से पंद्रह सौ रुपये महीने पर काम करने वाले शिक्षकों को सरकार की ओर से मानदेय तक नहीं दिया जाता है। इन शिक्षकों की कोई सेवा शर्तें भी लागू नहीं है। प्रबंधक जब चाहे किसी की नियुक्ति करे या जब चाहे छुट्टी कर दे। उधर प्रबंधकों का कहना है कि शुल्क सहित अन्य मदों से प्राप्त होने वाली आय इतनी नहीं होती कि 10 से 15 शिक्षकों तथा शिक्षणेत्तर कर्मचारियों को निर्धारित वेतन दिया जा सके।
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