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हालात से जंग लड़ रही शहीदों की धरती

Ghazipur

Updated Tue, 07 Aug 2012 12:00 PM IST
गाजीपुर। जंग-ए-आजादी में जिले के क्रांतिकारियों का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता है। उन क्रांतिकारियों की वीरता, त्याग और बलिदान की गाथा सुनकर आज भी लोगों का दिल दहल उठता है। हर वर्ष अगस्त का महीना आते ही लोगों की जुबान पर भारत छोड़ो आंदोलन (1942) की अगस्त क्रांति गूंजने लगती है। लोग शहीद क्रांतिकारियों के सम्मान में समारोहों का आयोजन कर उन्हें याद करने लगते हैं लेकिन बिजली, पानी, सड़क, दो जून की रोटी और रोजगार के लिए शहीदी धरती के लोग गलियों की खाक छानने को मजबूर हैं।
जिले के क्रांतिकारियों की वीरगाथा गर्व से भरी है। जिले में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति लोगों में विद्रोह की भावना क्यों जगी। आज इस प्रश्न का जवाब कुछ लोगों को छोड़ कर अधिकतर लोगों के पास नहीं है। बता दें कि सन् 1818 में अंग्रेजों ने गाजीपुर नगर को जिला बनाने की घोषणा की थी। इसकी सीमाएं निर्धारित करते हुए यहां का पहला कलेक्टर राबर्ट बारलो को बनाया। इसके साथ ही जगह-जगह पुलिस चौकियों की स्थापना की गई। अंग्रेजी हुकूमत ने गाजीपुर को जिला घोषित करने के बाद अपना पहला लक्ष्य शासकीय खजाना बनाया। इस लक्ष्य की तह तक जाने के लिए उसने जिले में नील और अफीम की खेती शुरू करा दी। इस खेती से जब सरकारी खजाना भरने लगा तब अंग्रेजी हुकूमत ने जनता पर दमनकारी चक्र चलाना शुरू कर दिया। यह चक्र चलते ही जिले के मजदूर, किसान, ग्रामीण, व्यापारी परेशान होने लगे। उनमें अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की भावना अंकुरित होने लगी। फलत: जिले के लोग अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल बजाने के अवसर की तलाश में लग गए। संयोग से उसी समय बलिया जो पूर्व में गाजीपुर जिले की एक तहसील था के एक सिपाही मंगल पांडेय ने बैरकपुर फौजी छावनी में चर्बी से बने कारतूस के उपयोग से भड़क कर अपनी राइफल से कई अंग्रेज अफसरों को गोली से भून डाला था। मंगल पांडेय की गोली से मृत कई अंग्रेज अफसरों की घटना में जिले के लोगों में क्रांति की लौ फूंक दी। देखते ही देखते अंग्रेजों के खिलाफ लोग लामबंद होते गए। रातों-रात हजारों की संख्या में क्रांतिकारी सड़क पर आ गए। इस बीच अंग्रेजी हुकूमत ने मंगल पांडेय पर मुकदमा चला कर उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया। इस वीर क्रांतिकारी की फांसी के फौरन बाद ही बलिया और गाजीपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति की लहर देखते ही देखते गांव तक फैल गई। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के नील गोदामों, फसलों एवं कोठियों पर धावा बोल दिया। चौरा गांव के लोगों ने एक अंग्रेजी काश्तकार को भी मार डाला। अंग्रेजों ने भी ताकत का भरपूर उपयोग कर आंदोलन को दबाने की कोशिश की। अंग्रेजी हुकूमत ने लोगों की धरपकड़ शुरू कर दी। अफसोस है कि आजादी के इतने वर्षों बाद शहीदों की धरती कहा जाने वाला गाजीपुर जनपद अभी भी उपेक्षा के हालात से जूझ रहा है।
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