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शिक्षा के प्रति समर्पित जीवन

Farrukhabad

Updated Wed, 05 Sep 2012 12:00 PM IST
आनंद मिश्रा
फर्रुखाबाद। कुछ लोग दूसरों के लिए जीवन समर्पित कर देते है। वे खुद की परवाह किए बगैर समाज के नवनिर्माण में लगते हैं और अपना पूरा ध्यान भविष्य की तस्वीर को खुशनुमा बनाने में लगा देते हैं। ऐसे ही शिक्षक हैं नरेश चंद दुबे। ये सरकारी तौर पर अध्यापक कार्य से मुक्त हो चुके हैं, लेकिन बच्चों का भविष्य सुधारने की ललक है की जाती ही नहीं। यही वजह है कि वह सेवानिवृत्त होने के बाद भी पहले की तरह मुफ्त में बच्चों को पढ़ा रहे हैं।
रिटायर टीचर नरेश चंद्र दुबे में बच्चों को पढ़ाने की ललक इस तरह रही कि उन्हें अधिकारी पद भी रास नहीं आया। उन्होंने प्रमोशन लेकर अफसर बनने के बजाय टीचर बनना स्वीकार किया।
वर्ष 2011 में प्राथमिक विद्यालय रेलवे रोड से सहायक अध्यापक के पद से सेवानिवृत्त हुए नरेश चंद्र दुबे शिक्षकों के लिए एक नजीर हैं। एमएम हिन्दी, अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने के बाद से ही बच्चों को पढ़ना शुरू कर दिया। पहले घर पर बच्चों को पढ़ाया, उसके बाद रामानंद इंटर कालेज और कर्नल ब्रह्मानंद इंटर कालेज में विज्ञान अध्यापक के पद पर तैनात हुए। बीटीसी के बाद बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक पद पर नौकरी मिली। प्राथमिक विद्यालय नवदिया में 1966 में अप्रशिक्षित अध्यापक के पद पर तैनात हुए। प्रशिक्षण के बाद एक अप्रैल 1971 को प्राथमिक विद्यालय बड़ा खेड़ा नगर क्षेत्र में तैनाती हुई। नौकरी के दौरान उनका न तो वेतन काटा गया और न ही कभी रुका। वर्ष 2001 में सहायक शिक्षाधिकारी नगर के पद पर नरेश चंद्र दुबे की तैनाती हुई। अधिकारी बनने के बाद बच्चों से दूरियां बन गई। यह दूरियां उन्हें इस कदर खली कि वह वर्ष 2007 में सहायक शिक्षाधिकारी नगर का पद त्याग कर दोबारा सहायक अध्यापक के पद पर तैनाती करा ली। नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद भी वह अपने आप को सेवानिवृत्त नहीं मानते। मोहल्ले के छोटे -छोटे बच्चों को घर पर बुलाकर उन्हे पढ़ाते हैं। नरेश चंद्र दुबे ने बताया कि जब बच्चे पढ़ेंगे तभी देश की तरक्की होगी। बच्चों को शिक्षित करना जीवन का मुख्य उद्देश्य हैं।
उन्होंने शिक्षकों के लिए संदेश दिया हैं कि वह विद्यालय समय से जाकर अपने कर्त्तव्यों का पालन करें ताकि बच्चे शिक्षित हो सके और समाज का नवनिर्माण हो सके।
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