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खंडहर में तब्दील होती जा रहीं द्वापर की धरोहरें

Farrukhabad

Updated Fri, 03 Aug 2012 12:00 PM IST
कायमगंज। पतित पावनी भागीरथी के तट पर स्थित द्वापर कालीन ऐतिहासिक धरोहर शासन और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा से अस्तित्व खोती जा रहीं है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से नगर के आस्थावान लोगों ने इनके जीर्णोद्धार के लिए इन्हें सजाने संवारने का काम शुरू कराया है। अब यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी आने लगे हैं। इसके लिए शासन पहल करे तो इन ऐतिहासिक धरोहरों को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजा जा सकता है।
कंपिल से लेकर फर्रुखाबाद तक गंगा किनारे फैली द्वापर कालीन विश्रातें शासन की उपेक्षा का शिकार हैं। हजारों साल पुरानी इमारतें रख-रखाव के अभाव में जीर्णशीर्ण हो कर जमींदोज होने की कगार पर हैं। इन ऐतिहासिक धरोहरों के अस्तित्व की परवाह किसी को नहीं है, जबकि जनपदवासियों को इनके इतिहास की बखूबी जानकारी है। इनका उल्लेख पुराने ग्रंथों में भी किया गया है।
जनपद के प्रख्यात संत त्यागीजी महाराज कारब वालों ने कई बार लोगों को इन धरोहरों के इतिहास से अवगत कराया था। स्वामी जी के अनुसार कायमगंज कस्बे से मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित मुडौल गांव का नाम पौराणिक परंपरा के अनुसार मुंडवन था। जहां महाभारत काल में पांडवों का मुंडन संस्कार हुआ था। इस मुंडवन में ही स्वर्णसर्वा नाम का स्थान आज भी मौजूद है। इस सरोवर पर गंगा किनारे मुंडन संस्कार कराया गया था। यहां पर भगवान शंकर का एक मंदिर मौजूद है। पौराणिक परंपरा के अनुसार इस मंदिर की स्थापना यक्ष नामक राक्षस ने की थी। इस स्थान के पास ही आखूनपुर नाम का गांव है। कहते हैं कि इस गांव का नाम पहले याहूण राक्षस के नाम से याहूणपुर था जो बदलते बदलते आखूनपुर हो गया। स्वर्णसर्वा को लोगों ने सोनसर्वा और मुंडवन को मुडौल के नाम से पुकारने लगे। सोनसर्वा विश्रातों के पास आज भी सरोवर है, जहां भीषण गर्मी में भी जल भरा रहता है। जिसे लोग दैवीय चमत्कार मानते हैं। यहां पहले गंगा की अविरल धारा बहती थी। आज भी स्नान पर्वों पर मेला लगता है और यहां लोग मुंडन संस्कार करवाते हैं।
सोनसर्वा केे पास ही एक टीले पर हनुमान जी का प्राचीन मंदिर स्थित है। ग्रंथों के अनुसार इस मंदिर की स्थापना द्वापर युग में सिद्धबाबा ने की थी इसी लिए इसका नाम सिद्धपीठ पड़ा। बताते हैं कि महाभारत काल में द्रोणाचार्य यहां पूजा करने आते थे। राजा द्रुपद के पुत्र शिखंडी जो नपुंसक थे उन्हें अपना पुरूषार्थ पाने के लिए द्रोणाचार्य ने सिद्धपीठ की पूजा करने का उपाय सुझाया था। जिस पर शिखंडी ने कंपिल से यहां आकर पूजा शुरू कर दिया। चूंकि शिखंडी नपुंसक थे इस लिए कंपिल से यहां तक दस किलोमीटर की दूरी के बीच पड़ने वाले गांवों के बच्चे उन्हें आते जाते छेड़ा करते थे। इसकी शिकायत जब शिखंड़ी ने राजा द्रुपद से की तो उन्होंने कंपिल से सिद्धपीठ मंदिर तक सुरंग बनवा दी थी। इस सुरंग के अवशेष कुछ वर्षों पूर्व तक देखे जाते थे किंतु लोगों ने मिटटी खनन के साथ साथ इस सुरंग का नामोनिशान गायब कर दिया। शहर के किनारे पर स्थित शिवालय मंदिर भी इन्हीं धरोहरों में से एक है। बताते हैं कि द्रोपदी के स्वयंवर में जब भगवान श्री कृष्ण कंपिल आए थे तो उन्होंने मुंडवन में रूककर इसी शिवालय मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की थी और स्वर्णसर्वा में स्थित शिवलिंग के दर्शन किए थे।
ककइया ईंटों और चूना राबिश से बने ये एतिहासिक और पौराणिक स्थलों की और आज तक किसी ने कभी कोई गौर ही नहीं किया जिस कारण ये इमारतें धीरे धीरे खंडहर में तब्दील होती जा रही हैं। कई बार लोगों ने जनप्रतिनिधियों से इनका जीर्णोंद्धार करवाने इन तक पहुंचने के मार्ग को बनवाने की मांग की किंतु हर बार उन्हें थोथे आश्वासनों के सिवा कु छ भी हाथ नहीं लगा। वर्ष 1991 में मौजूदा राज्य सभा सदस्य टीएन चतुर्वेदी ने अपनी सांसद निधि से सोनसर्वा के निकट एक छायाग्रह का निर्माण कराया था वह भी आज जर्जर हालत में पहुंच चुका है।
हनुमान गढ़ी मंदिर शहर से दो किलोमीटर की दूरी पर मुडौल गांव के पास जमीन से लगभग 60-70 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। निर्जन स्थान पर होने के कारण यहां असामाजिक तत्वों का जमावड़ा रहता था। यहां पुजारियों के साथ कई बार घटनाएं हुईं। खंडहर में तब्दील होते मंदिर को बचाने के लिए कुछ वर्षों पूर्र्व नगर के आस्थावान लोगों ने हनुमान गढ़ी को सुरक्षित रखने का बीड़ा उठाया। उनकी इस पहल में नगरवासियों ने दिल खोल कर साथ दिया और निर्माण कार्य शुरू हो गया। लोगों की आवाजाही देखकर असामाजिक तत्वों ने कई बार मंदिर में चोरी की घटनाओं को अंजाम दिया किंतु श्रद्धालुओं के इरादे नहीं बदल सके। मंदिर परिसर में विशाल भवन का निर्माण जारी है। साल में दो बार भंडारे का आयोजन किया जाता है। पूर्व ब्लाक प्रमुख मीना माथुर ने मंदिर के लिए सड़क का निर्माण भी कराया था। लोगों के प्रयास से पौराणिक धरोहर की रौनक लौट आई है। अब यहां सारा दिन साधू-संतों और श्रद्धालुओं का जमावड़ा रहता है।
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