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आधुनिक तकनीक मिले तो दिखा देंगे जलवा

Farrukhabad

Updated Wed, 12 Dec 2012 05:30 AM IST
फर्रुखाबाद। जर्मनी, बेल्जियम, बिट्रेन, अमेरिका सहित करीब 15 देशों में निर्यात होने के बाद भी जिले का वस्त्र छपाई कारोबार तकनीक के मामले में पीछे है। यही वजह है कि मांग के अनुरूप उत्पादन नहीं हो पा रहा है। जो भी उत्पादन होता है उसमें करीब 80 फीसदी निर्यात हो जाता है। ऐसे में अपने देश के लिए माल बच ही नहीं पाता। कारोबारियों का कहना है कि टेक्सटाइल पार्क से उम्मीदें हैं। यह मसौदा परवान चढ़ जाए तो पांच साल में 5000 करोड़ का निर्यात कारोबार हो सकता है। घरेलू बाजार भी पांच गुना बढ़ सकता है। 137 साल पुराने इस कारोबार को और पुख्ता करने की जरूरत है। क ारोबारी लगे हैं। नतीजे सामने आएंगे।
अपने हुनर पर तमगे भी पाए
डब्लूएल एलीसन की किताब द साध के मुताबिक फर्रुखाबाद की बुनियाद दिसंबर 1714 में रखी गई। 1875 में कपड़ा छपाई कारोबार शुरू हुआ। तब आलू का ब्लाक बनाकर कपड़ों पर डिजायनर छपाई होती थी। इसके बाद लकड़ी के ब्लाकों से छपाई होने लगी। वर्ष 1960 के बाद स्क्रीन प्रिंटिंग से काम होने लगा। 1893 में शामलाल जुगुलकिशोर साध की कंपनी को शिकागो में कोलंबियन एक्सपोजीशन पर जगह मिली थी। इतिहासकार एचएन मिश्र के मुताबिक सन् 1900 की यूनीवर्सल एक्जीविशन में सुमेर चंद और शामलाल की फर्म को सोने का मेडल दिया गया था। कोलकाता की आर्ट एक्जीविशन में लार्ड मिंटाें ने भी मेडल दिया था। 1903 में वायसराय के राज्याभिषेक में यहीं के परदाें से कमराें को सजाया गया था।

इन देशाें में होता निर्यात
जिले के वस्त्र छपाई उद्योग में तैयार आइटम जर्मनी, बेल्जियम, बिट्रेन, अमेरिका, इटली, पाकिस्तान, ईरान, ईराक, दुबई, पाकिस्तान, अफ्रीका, इजरायल, हंगरी, टर्की, रूस देशों को निर्यात होते हैं।

ज्यादा नहीं बदला काम का तरीका
शुरू में यह काम ढाई फ ीट चौड़ी व पांच फ ीट लंबी लकड़ियाें की पटिया पर होता था। इनके ऊपर टाट की कई परतें लगाई जाती थीं। इसके ऊपर कपड़ा बिछाया जाता था। इस पर छपने वाले कपड़े पर लक ड़ी के ब्लाक से डिजायन छापी जाती थी। लकड़ी के ब्लाक को रंग की गद्दियाें से रंग छापे में लगाकर सूती साड़ी, रेशमी साड़ी, रजाई पल्लों पर छपाई होती थी। 1960 में स्क्रीन आने के बाद भी लकड़ी के ब्लाकाें से छपाई हो रही है।

टाई के मुरीद भी हैं विदेशी
फर्रुखाबाद में छपी टाई क े कई देश मुरीद हैं। कपड़े पर डिजायन छापी जाती हैं। अब इंब्रायडरी का भी काम होने लगा है। यह सिल्क, काटन, विस्कास पर छपाई की जाती है। ऊनी कपड़ों पर भी छपाई होती है।

मांग के मुताबिक नहीं हो रहा उत्पादन
1960 के बाद स्क्रीन मशीनें आईं। यह भी हाथ से चलती हैं। इससे उत्पादन तो बढ़ा लेकिन बाजार की मांग के मुकाबले डिमांड पूरी नहीं हो पा रही है। 10 गुना ज्यादा उत्पादन की जरूरत है। इससे देसी व विदेशी दोनों बाजारों की मांग पूरी हो जाएगी। वस्त्र छपाई उद्योग समिति के अध्यक्ष सुरेंद्र सफ्फड़ का कहना है कि कारोबारियों को बेहतर तकनीकी सुविधाएं मिलें तो उत्पादन में कई गुना इजाफा हो सकता है।

बंद हो गई कंबल बुनाई
सन् 1900 के आसपास कंबल की बुनाई भी होती थी। मोटे कपडे़ को भी बुना जाता था। छपाई के साथ करघे भी चलते थे। कंबलाें की भारतीय बाजारों में मांग थी। निर्यात क ी संभावनाएं कम होती थीं। बाद के कुछ दिनों में कंबल बुनाई बंद हो गई।

हुनर का पाकिस्तान भी दीवाना
पडा़ेसी पाकिस्तान की भारत के बारे में भले ही ठीक राय न हो लेकिन जिले के हुनर के दीवानों की वहां भी कमी नहीं है। इंडियन इंडस्ट्रीज एसोशिएसन के फर्रुखाबाद चैप्टर चेयरमैन रोहित गोयल बताते हैं कि रजाई, साड़ी, शाल व ड्रेस मैटेरियल पाकिस्तान को भी निर्यात होता है।

साड़ी, शाल, लिहाफ, परदे, बेडशीट भी
साड़ी, शाल, परदे व बेडशीट पर भी छपाई होती है। इनका घरेलू बाजार विदेशी निर्यात से ज्यादा है। विदेशी व देसी बाजार में इनकी हिस्सेदारी 50 करोड़ के तकरीबन है। इनकी साल भर मांग आती है।

खासियतों से भरी है रजाई
फर्रुखाबादी रजाई हाथ के हुनर का खूबसूरत कमाल है। इसमें छपे हुए कई कपड़ों को काट कर लिहाफ बनाया जाता है। इसमें सर्जिकल रुई की परतें डाली जाती हैं। इसके बाद हाथ की सिलाई होती है। एक रजाई 15 से 20 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी कीमत 3000 रुपए के करीब आती है। इस कारोबार में 7 हजार कारीगरों को काम मिला हुआ है। कन्नौज, हरदोई, मैनपुरी, शाहजहांपुर में भी रजाई तैयार होने जाती हैं।

स्टोल और स्कार्फ
पंाच साल पहले देसी व विदेशी बाजार में स्टोल व स्कार्फ की मांग बढ़ गई। इसने वस्त्र छपाई उद्योग को आक्सीजन देने का काम किया है। जिले से कुल निर्यात में 80 फीसदी स्टोल व स्कार्फ की हिस्सेदारी होती है। स्कार्फ 100 गुणा 100 सेंटीमीटर का प्रिंटिड डिजायनर क पड़ा है। स्टोल 100 गुणा 180 सेंटीमीटर का प्रिंटिड डिजायनर दुपट्टा होता है। स्टोल की कीमत 500 रुपए व स्कार्फ की कीमत 700 रुपए प्रति पीस है।

ये हैं चुनौतियां
सूत से वस्त्र तैयार करने वाला शहर में एक ही लूम है। यह कारोबारियों की मांग पूरी नहीं कर पाता है। इससे बंग्लुरु, महाराष्ट्र, अहमदाबाद, सूरत, दक्षिण भारत से कपड़ा की खरीद की जाती है। इसमें ज्यादा समय खर्च होता है। कपड़ा भी मंहगा हो जाता है। रंग जांच की प्रयोगशाला दिल्ली व मुंबई में है। सैंपल की जांच रिपोर्ट आने में देरी होती है । इससे आर्डर तैयार होने में मुश्किल आती है। कभी कभी आर्डर कैंसिल भी हो जाते हैं। सप्लायर को जिले में ठहराने की बेहतर सुविधाएं नहीं हैं। ट्रासंपोर्टेशन के इंतजाम भी कमजोर हैं। जरूरत के अनुसार ट्रेन सुविधाएं नहीं हैं। बिजली की आपूर्ति 10 घंटे भी नहीं मिल पाती है।

टेक्सटाइल पार्क से उम्मीदें
टेक्सटाइल पार्क से इस कारोबार को खासी उम्मीदें हैं। शहर से वापस गए कारोबारी भी वापस लौटने के लिए तैयार हो गए हैं। वह वापस आने लगे तो कारोबार को पंख लग जाएंगे। रोजगार के मौके बढे़ंगे। निर्यात का कारोबार 10 गुना ज्यादा हो जाएगा। नए आइटमों के निर्यात के रास्ते भी खुलेंगे। रजाई का कारोबार भी बढ़ जाएगा। अभी मांग के मुताबिक कारोबारी निर्यात नहीं कर पा रहे हैं। पार्क में एक साथ कई यूनिटें लगेंगी। यहां कारोबार के मद्देनजर सारी सहूलियतें मुहैया होंगी। कारोबार को तकनीकी लिहाज से भी उन्नत किया जाएगा। रोहित गोयल का कहना है कि पहल तेज की जा रही है।
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