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एफडीआई: खुदरा व्यापार हो जाएगा चौपट

Etawah

Updated Tue, 18 Sep 2012 12:00 PM IST
इटावा। डीजल के मूल्यों में वृद्धि और रसोई गैस पर राशनिंग के झटके से जनता उबर भी नहीं पाई थी कि ख्ुादरा व्यापार में एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) को मंजूरी दे दी गई। लोगों में इसे लेकर खासी नाराजगी है। खासकर व्यापारी वर्ग ठगा सा महसूस कर रहा है। उनका कहना है कि एफडीआई से खुदरा बाजार पूरी तरह चौपट हो जाएगा। बेरोजगारी बढ़ेगी। व्यापारी इसके विरोध में हुंकार भरने लगे हैं। कह रहे हैं कि केंद्र सरकार का इस फैसले का पुरजोर विरोध किया जाएगा। 20 सितंबर को भारत बंद के तहत इटावा में भी अभूतपूर्व बंदी होगी। हालांकि बुद्धिजीवी और अर्थशास्त्री की सोच इसके विपरीत है। उनका कहना है कि यदि एफडीआई के तहत आने वाली विदेशी कंपनियां बिक्री के माल हमारे देश से ही खरीदें तो इसका लाभ देश को मिलेगा। किसानों को उत्पादन का अच्छा मूल्य मिलेगा और रोजगार के अवसर भी बढे़ंगे।
बेरोजगारी बढ़ेगी
उप्र उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल के जिलाध्यक्ष अनंत प्रताप अग्रवाल का कहना है कि एफडीआई से पूरे देश का खुदरा बाजार चौपट हो जाएगा। छोटे-छोटे दुकानदार बर्बाद हो जाएंगे। उनके यहां काम करने वाले लोग बेरोजगार हो जाएंगे। मॉल संस्कृति के जरिए लोगों को रोजगार मिलेगा लेकिन इनकी संख्या बहुत कम होगी। सरकार अपने दामन पर लगे भ्रष्टाचार के दाग से जनता का ध्यान हटाने के लिए यह सब कर रही है। सरकार सिर्फ बड़े-बड़े घोटालों और भ्रष्टाचार के मामलों को खोल दे तो विदेशी निवेश की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। अपना देश स्वत: ही आर्थिक रूप से मजबूत हो जाएगा। उन्होंने कहा कि एफडीआई का पुरजोर विरोध किया जाएगा। इसको किसी कीमत पर लागू नहीं होने दिया जाएगा।

बर्बाद होंगे कारीगर
सर्राफा व्यवसायी और इटावा सराफा एसोसिएशन के अध्यक्ष श्याम सिंह वर्मा कहते हैं कि खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से छोटे-छोटे दुकानदार बर्बाद होंगे। उनसे जुड़े कारीगर, डाई वाले आदि बर्बाद हो जाएंगे। सरकार कहती है एफडीआई से किसानों एवं अन्य उत्पादकों को उनके माल का बेहतर मूल्य मिलेगा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। यह सब सिर्फ जनता को गुमराह करने की साजिश है। वह कहते हैं कि खुदरा बाजार में विदेशी कंपनियां आने का अर्थ छोटे दुकानदारों के पेट पर लात मारने के समान है। इसको किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। उनके सराफा व्यवसाय में कारोबारी से लेकर कारीगर, डाईकटर आदि सब कड़ी के रूप में जुड़े हैं। सभी के सभी बर्बाद हो जाएंगे।

क्या करेंगे दुकानदार
किराना व्यवसायी विशाल जैन कहते हैं कि एफडीआई के जरिए खुदरा बाजार में विदेशी कंपनियां प्रवेश करेंगी। छोटे-छोटे शहरों में विदेशी निवेश के जरिए किराने की चकाचौंध करने वाली दुकानें खुल जाएंगी। इससे उनकी दुकानों की चमक फीकी पड़ जाएगी। वह कहते हैं कि बड़े-बड़े क्षेत्रों में विदेशी निवेश हो तो सही है लेकिन देश की आर्थिक स्थिति की रीढ़ कहा जाने वाला खुदरा बाजार पर भी सरकार कुठाराघात कर रही है। इससे पूरे देश में ही हायतौबा मच जाएगी। सरकार का यह फैसला गलत है इसको बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।

यहीं खरीदें और बेंचे
डॉ. एमएम पालीवाल कहते हैं कि एफडीआई अर्थात प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का खुदरा बाजार में सीधा प्रवेश उसी दिशा में अच्छा कहा जा सकता है जब विदेशी कंपनियां हमारे देश के किसानों और निर्माताओं से माल खरीदें और बेंचे। यदि वह अपने देश से माल लेकर हमारे देश में बेचेंगी तो निश्चित रूप से इसका खुदरा व्यवसाय पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। यदि हमारे देश के ही माल खरीदकर हमारे लोगों के बीच बेंचेंगे तो निश्चित रूप से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और इसका लाभ भी मिलेगा।

विरोध आर्थिक कम राजनीतिक अधिक
अर्थशास्त्री प्रो. आरके अग्रवाल कहते हैं कि हिंदुस्तान में 125 करोड़ की आबादी है। बहुत बड़ा उपभोक्ता बाजार है। इस नाते एफडीआई से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। निर्माता, विक्रेता में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इसका लाभ किसानों, उपभोक्ताओं को मिलेगा। उन्होंने बताया कि आज आलू 15 रुपए किलो है लेकिन किसानों का आलू तो सस्ते में पहले ही बिक गया। अब व्यापारी और होल्डर का बिक रहा है। इसी तरह गेहूं जो पहले 1000 रुपए किसानों का बिक गया आज 1700 रुपए है। उसका लाभ बड़े किसानों व व्यापारियों को हो रहा है। उन्होंने कहा कि एफडीआई की आलोचना सिर्फ दस फीसदी बड़े किसान ही कर रहे हैं। राव सरकार ने उदारीकरण की नीति अपनाई जिसका भारी विरोध हुआ। आज उसका देश का फायदा हुआ। कंप्यूटर आया तो बवाल मचा। आज इतने मॉल खुल गए हैं। इसका कितना प्रभाव खुदरा व्यापार पर पड़ा। ईस्ट इंडिया कंपनी के आने का दौर अलग था तब आबादी कम थी आज आबादी शिक्षित भी है। एफडीआई का विरोध आर्थिक रूप से कम राजनीतिक रूप से अधिक है।
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