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कुश्ती के प्रति दीवानगी का नाम है उस्ताद लाला गोविंद पहलवान

Etawah

Updated Wed, 05 Sep 2012 12:00 PM IST
इटावा। 68 साल की उमर में वह आज भी देशी-अंग्रेजी कसरत करते हैं। गिनकर सवा सौ बैठकें लगाते हैं। तड़के उठना आज भी जारी है। सुबह करीब 9 किमी पैदल चलते हैं। लोग उन्हें प्यार से उस्ताद लाला गोविंद पहलवान कहते हैं। पहले खुद की कुश्ती और बाद में कुश्ती सिखाने की उनकी दीवानगी ही है कि ताउम्र अविवाहित रहने का निर्णय ले लिया। आज भी अपने घर पर बनाए जिम में युवाओं की सेहत निखार रहे हैं। अखाड़े को छोड़े उन्हें भले ही 22 बरस बीत चुके हों लेकिन उनके शार्गिदगी में दस पहलवानों ने जिला जीत जैसे अहम तमगे हासिल किए हैं। अलावा इसके कई नगर जीत भी शामिल हैं। उनके शिष्य ऐसे गुरु पर नाज करते हैं।
गोविंद बल्लभ अग्रवाल कटरा सेवा कली में रहते हैं। कई नामी गिरामी पहलवानों की गवाह बगिया अखाड़ा के वह पूर्व खलीफा रहे हैं। उस्ताद पहलवान का दर्जा हासिल है। पिता राधा बल्लभ की पहलवानी का शौक रखते थे। वर्ष 1957 में उनकी उम्र 16 साल की रही होगी। लालाराम पहलवान ने उन्हें भी कसरत शौक लगाया। उस्ताद आगा पहलवान ग्वालियर से आकर बगिया अखाड़ा में ही रहने लगे। उनसे ही कुश्ती के दांव पेच सीखे। कुश्ती और साधना दोनों का एक साथ ऐसा जोर उनके दिलो दिमाग पर छाया कि फिर उन्होंने शादी न करने का निर्णय ले लिया। अपने इस निर्णय आज भी वह संतुष्ट हैं। वे कहते हैं कि कुश्ती करना आसान है, सिखाना मुश्किल। यह काम बिना साधना के नहीं हो सकता था।
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दुश्मनी से बचने के लिए नहीं लड़ी खिताबी कुश्ती
सईद, वारिस, शेरा, कल्लू ऐसे कई जिला जीत पहलवानों के उस्ताद लाला गोविंद ने खुद कभी खिताबी कुश्ती नहीं लड़ी। वजह बताते हैं कि बाबा इसके हमेशा खिलाफ रहे। यह कहते हुए कभी खिताबी भिड़ंत के अखाड़े में नहीं उतरने दिया कि इससे दुश्मनी पैदा हो जाती है। वो दौर था ही ऐसा, कुश्ती के लिए एक जुनून दिखता था लोगों में। आज भी कुश्तियां होती हैं पर वो जुनून नहीं दिखता। उन्होंने अपने शार्गिदों को मेहनत से जिलाजीत तो बनवा दिया लेकिन सरकार से मदद नहीं मिली। खाना खुराक सब कुछ आगे बढ़ने में मायने रखते हैं। वे कहते हैं कि पहलवानी के लिए ब्रह्मचर्य का पालन बेहद जरूरी है।
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