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सपा के कद्दावर नेता के रूप में बनाई थी छवि

Etawah

Updated Sat, 18 Aug 2012 12:00 PM IST
इटावा। हृदयाघात पड़ने से मौत के आगोश में सोये बसपा के निवर्तमान विधायक महेंद्र सिंह राजपूत ने वर्षों समाजवादी पार्टी में रहकर कद्दावर नेता के रूप में छवि बनाई थी। इसी पार्टी में रहकर वह जनप्रतिनिधि के रूप में पहली बार जिला पंचायत अध्यक्ष बने और उसके बाद दो बार इटावा सदर सीट से विधायक चुने गए। इटावा सदर शहरी सीट होने के कारण समाजवादी पार्टी को इस पर कड़ा संघर्ष करना पड़ता था। तब महेंद्र सिंह राजपूत ने ही इस सीट पर सपा को मजबूती दिलाने का कार्य किया। हालांकि बाद में नाराज होकर 2009 बसपा में चले गए और उप चुनाव में फिर से विधायक निर्वाचित हुए। वर्ष 2012 के चुनाव में बसपा प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे तो सपा को दो बार सांसद रह चुके रघुराज सिंह शाक्य को उनके मुकाबले में उतारना पड़ा। इस सीट को हासिल करने के लिए महेंद्र सिंह राजपूत के कारण ही सपा को एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा।
निवर्तमान विधायक महेंद्र सिंह राजपूत का राजनीतिक सफर समाजवादी पार्टी से ही शुरू हुआ। युवावस्था का जोश होने के कारण जल्द ही उन्होंने सपा मुखिया के करीब होने की स्थिति हासिल कर ली। जिसका परिणाम यह हुआ कि सपा के शुरूआती दौर में उन्हें जिला महासचिव के अहम पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। वर्ष 1995 में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में वह महेवा प्रथम से जिला पंचायत सदस्य निर्वाचित हुए। इसी कार्यकाल में जिला पंचायत अध्यक्ष रहे शिवपाल सिंह यादव जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र से सपा मुखिया द्वारा सीट छोड़े जाने से हुए उप चुनाव में निर्वाचित हुए। लिहाजा जिला पंचायत अध्यक्ष पद से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा तब सपा मुखिया के खासमखास होने का लाभ महेंद्र सिंह राजपूत को मिला और वह जिला पंचायत अध्यक्ष चुन लिए गए।
सदर विधानसभा क्षेत्र शहरी सीट होने के कारण समाजवादी पार्टी को उस दौर में इस सीट पर काफी संघर्ष करना पड़ता था। वर्ष 1993 में इस सीट से सपा से निर्वाचित जयवीर सिंह भदौरिया के बाद में भाजपा में चले जाने के कारण इस सीट के लिए सपा मुखिया को एक अदद प्रत्याशी की तलाश रही। हालांकि उसके बाद हुए चुनाव में उन्होंने सत्यनारायण दुबे को लड़ाया परंतु सफलता नहीं मिली। तब 2002 के चुनाव में इस सीट से पिछड़ा कार्ड खेलते हुए सपा मुखिया ने महेंद्र सिंह राजपूत को लड़ाया। इस चुनाव में श्री राजपूत जीतकर पहली बार विधायक बने। इससे वह सपा मुखिया के और खासमखास हो गए। वर्ष 2007 के चुनाव में फिर से सपा के टिकट से इस सीट से विधायक चुन लिए गए।
एक वर्ष बाद ही पार्टी के कुछ नेताओं के कारण उनकी पार्टी से रुष्टता बढ़ गई। चूंकि वर्ष 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत से सरकार चुन ली गई थी। इस कारण उन्होंने बसपा में अपनी पैठ बनाना शुरू कर दिया। वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने सपा को अलविदा कह दिया और बाद में विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। फलस्वरूप बसपा शासन में इटावा सदर सीट के लिए उपचुनाव हुआ जिसमें वह भारी मतों से विजयी रहे। हालांकि उम्मीद यह की जा रही थी कि बसपा शासन में उन्हें मंत्री बनाया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हो सका। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सदर सीट से बसपा से प्रत्याशी हुए। इस चुनाव में सपा को दो बार सांसद रहे रघुराज सिंह शाक्य को मैदान में लाना पड़ा। इस चुनाव में भी सपा को जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा था।
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