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बकाया मिले तो ढूंढ लेंगे ठिकाना

Etawah

Updated Thu, 03 May 2012 12:00 PM IST
इटावा। डीएम से गुहार लगाने के बाद किसी राहत की उम्मीद न मिलते देख सूत मिल की लेबर कालोनी में रह रहे श्रमिक कर्मचारियों के परिवारों की इन दिनों नींद हराम है। गरीबी से जूझ रहे इन श्रमिक परिवार के लोगों का कहना है कि इस शहर में उनका और कोई आशियाना नहीं है। ऐसे में वे बेघर होने के बाद कहां जाएं। मिल को बंद हुए दो दशक बीत चुके हैं। वेतन, फंड आदि का भुगतान हो जाए तो कहीं और ठिकाना ढूंढ लेंगे।
माली हालत बेहद खराब
मिल की लेबर कालोनी में रह रहे श्रमिक परिवारों की माली हालत बेहद खराब है। ज्यादातर श्रमिकों की मौत हो चुकी है। अब उनकी विधवाएं अपने पुत्रों के साथ रह रही हैं। जो जैसे तैसे गुजर बसर कर रही हैं। कालोनी को देखें तो अमूमन की हालत जर्जर है। गरीबी दूर से नजर आती है। घरों के आगे डोरी पर फटे पुराने कपड़े टंगे दिखते है। रसोई गैस के इस दौर में आज भी खाना लकड़ी कोयला जलाकर पकता है।
इस तरह की चर्चाएं
कालोनी में रह रहे लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं हैं। यहां रह रहे सुखलाल बताते है कि कोई कह रहा था कि कालोनी को खाली करा कर फिर से धागा मिल शुरू की जाएगी। वहीं किसी ने बताया कि यहां रोडवेज बस स्टैंड बनेगा।
परिवार लेकर कहां जाएं
मिल कर्मचारी रामनारायन की करीब साढ़े पांच साल पहले मृत्यु हो चुकी है। पत्नी अनारा देवी अपनी दो पुत्रवधुओं के साथ रहती हैं। अनारा देवी के मुताबिक उनके दो लड़के हैं। जो प्राइवेट नौकरी करते है। उसी से परिवार की गुजर बसर हो रही है। पति के करीब डेढ़ लाख रुपए बकाया है। मिल जाए तो कहीं और ठिकाना ढूंढ लेंगे।
मजदूरी करके पेट पाल रहे
सावित्री देवी भी अपने अविवाहित पुत्र मुकेश की मजदूरी के सहारे जीवन यापन कर रही हैं। पति वासुदेव का निधन हो चुका है। वह बताती है कि उनके पति का भी करीब एक लाख रुपए का भुगतान नहीं हुआ है। अब ऐसे में यहां से निकल कर बगैर रुपयों के कैसे कोई घर मिलेगा।
गैरेज में बनाया आशियाना
कालोनी में बने एक पुराने गैरेज में वीरावती रहती हैं। उनके मुताबिक ससुर शोभाराम और सास कलावती दोनों की मृत्यु हो चुकी है। पति सुरेंद्र मजदूरी करते हैं। ससुर मिल में कारीगर थे। करीब 3 लाख रुपए का बकाया है। रहने को छत है यहीं सोच कर दिन काट रहे हैं।
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