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लहसुन के भाव धड़ाम: किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें

Etawah

Updated Thu, 06 Dec 2012 05:30 AM IST
ऊसराहार(इटावा)। पचार क्षेत्र की प्रमुख फसल लहसुन में आई मंदी ने किसानों और लहसुन कारोबारियों के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं। हाल यह है कि अच्छी पैदावार के बाद भी किसानों की लागत तक नहीं निकल रही है। ऐसे में किसान मजबूरी में मेहनत से उगाई लहसुन की फसल को कौड़ियों के भाव बेच रहा है। मंडी के लोग बताते हैं कि बीते सालों में 20 हजार रुपए कुंतल तक पहुंचा लहसुन का भाव वर्तमान में फसल के दौरान सौ रुपए से 500 रुपए कुंतल तक ही रह गया है।
हाड़ कंपाने वाली सर्दी हो या तन झुलसा वाली गर्मी। हाड़ मास एक कर देने वाली मेहनत के बाद किसान फसल उगाता है। फसल अच्छी हो जाए और उसका सही मूल्य मिल जाए तभी किसान की मेहनत सफल होती है। लेकिन जब फसल माटी के मोल बिके तो किसान के सारे सपने चूर-चूर हो जाते हैं। कमोबेश यही हाल इन दिनों पचार क्षेत्र के लहसुन की पैदावार करने वाले किसानों की है। इस मर्तबा लहसुन की पैदावार तो अच्छी हुई है, लेकिन भाव धड़ाम हो गया है। इस वर्ष राजस्थान, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर लहसुन की फसल बोई गई थी साथ ही उत्तर प्रदेश में भी बड़े भू भाग पर लहसुन की फसल उगाई गई। इटावा के पचार क्षेत्र में भी लहसुन की खूब पैदावार हुई। बंपर पैदावार होने के चलते बीते वर्षों में 20 हजार रुपए प्रति कुंतल की दर तक बिका लहसुन इस वर्ष बाजार में माटी मोल हो गया। प्रति कुंतल लहसुन 100 रुपए से 500 रुपए बिक रहा है। हालत यह है कि सगा सहित फसल को सुरक्षित रखने वाले किसान इसकी सफाई में आने वाले खर्चे के बराबर भी फसल का मूल्य होने से सगा की सफाई तक नहीं करा पा रहे हैं।
किसान सभा के जिलाध्यक्ष विश्राम सिंह के मुताबिक लहसुन किसानों क ी लागत तक नहीं निकल पा रही है। ऐसे में सरकार ने ध्यान न दिया तो किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो सकता है। टांडेहार निवासी किसान कैलाशबाबू बताते हैं कि उन्हाेंने एक एकड़ में लहसुन की फसल बोई थी। उसे बाजार में दो सौ रुपए प्रति कुंतल की दर से कुल पांच हजार रुपए में बेचा है जबकि उनकी कुल लागत बीस हजार रुपए एकड़ आई थी। ग्राम प्रधान संग्राम सिंह चौहान बताते हैं कि उन्हाेंने अपनी लहसुन की फसल को सगा से साफ नहीं करवाया है क्योंकि उतनी लागत की कुल फसल भी नहीं हो पा रही है। कस्बा ऊसराहार के व्यापारी विनोद गुप्ता बताते हैं कि इस वर्ष किसानों के साथ व्यापारी भी भारी घाटे में है क्योंकि बाजार में भाव ऊंचे से लगातार गिरते ही चले आ रहे है। ज्यादातर व्यापारियों ने इस वर्ष लहसुन का व्यापार ही नहीं किया।
प्रदेश में लहसुन की प्रमुख मंडियां घिरोर, कुरावली, भोगांव, ऊसराहार, उमरैन, कानपुर आदि हैं। इन मंडियों से लहसुन पश्चिम बंगाल के कोलकाता, दुर्गापुर, महाराष्ट्र के नागपुर, अक ोला, मुंबई, झारखंड की बोकारो, रांची, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ की लहसुन मंडियाें सहित बंगलुरू, दिल्ली आदि स्थानों पर भेजा जाता है। झारखंड बोकारो के व्यापारी हीरालाल ने दूरभाष पर बताया कि बीते वर्षों में लहसुन की कीमत आसमान छूती रही थी, जिसक ी वजह से अबकी बड़े भू- भाग पर लहसुन की फसल बोई गई। लहसुन की मंदी का यही कारण रहा।
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