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फौजी के जज्बे ने बदल दी गांव की तकदीर

Etah

Updated Fri, 16 Nov 2012 12:00 PM IST
एटा। फौजी उदयपाल सिंह भदौरिया ने सेवानिवृत्ति के बाद भी संघर्ष का जज्बा नहीं छोड़ा। उनकी सोच और कोशिशें गांव के लिए वरदान बन गईं। नहर के बंबे के बीच की खेती को डसने वाला जलभराव आज यहां सिंघाड़े के रूप में किसानों को मालामाल कर रहा है।
जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर ग्राम बरौली है। यहां रहने वाले उदयपाल सिंह भदौरिया के प्रयासों ने बदहाल गांव में बहार ला दी है। फौजी उदय पाल ने बताया कि नहर और बंबे के बीच के खेतों में हर साल जलभराव के चलते डूबने वाली फसलों में लागत तक नहीं मिलती थी। ऐसे में बदतर हो रही किसानों की आर्थिक स्थिति उनके लिए चुनौती बन गई थी। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने इन परिस्थितियों से लड़ने का निर्णय लिया। जलेसर के नूंहखेड़ा क्षेत्र में पानी का सदुपयोग करने वाले किसानों ने उन्हें प्रेरित किया। उन्होंने वहां के किसानों से इस बारे में पूरी जानकारी ली। साथ ही थोड़ी सी सिंघाड़े की बेल लाकर पानी में डाल दी। थोड़े ही दिनों में यह बेल बढ़कर पूरे खेत में फैल गई। फिर क्या था भाग्य ने पलटा मारा और बेल ने कमाल दिखाना शुरू कर दिया। अभिशाप बन रहा पानी उनके लिए वरदान बन गया। आज पूरा गांव जलमगभन खेतों में सिंघाड़े की खेती कर प्रगति के नये आयाम बना रहा है। बताते चलें कि आज गांव के 50 प्रतिशत किसान सिंघाड़े की खेती से जुड़े हैं। फौजी के अनुसार शुरू में उनके प्रयासों को पागलपन कहकर मजाक बनाने वाले आज उनकी राह पर चल रहे हैं। वह बताते हैं कि शुरू में गांव वाले कहते थे कि कुछ नहीं होने वाला है, लेकिन अब सफल होने पर अधिकतर उनका अनुसरण करने लगे हैं। गरीबों को भी रोजगार। सिंघाड़े की खेती जहां किसानों को मालामाल कर रही है, वहीं भूमिहीन गरीबों-बेरोजगारों के लिए भी वरदान बन रही है। खेती के दिनों में सिंघाड़े तोड़ने के लिए सैकड़ों लोगों को रोजगार मिलता है। पुरुष ही नहीं महिलाएं बच्चे भी इस काम में हाथ बंटाकर हजारों के बारे न्यारे करते हैं। 140 हेक्टेयर में हो रही सिंघाड़े की फसल
किसान रामदत्त कहते हैं कि गांव की 140 हेक्टेयर भूमि पर जलभराव रहता था। इस भूमि पर किसान पहले धान, गेहूं और लहसुन की खेती करते थे। हर साल नहर और बंबा ओवरफ्लो होने पर खेतों में जलभराव हो जाता था। इससे फसलें बर्बाद हो जाती थी। फौजी ने पहले प्रयास किया। उनके प्रयास सफल होने पर जिन किसानों की 140 हेक्टेयर क्षेत्रफल में खेत शामिल थे, वे भी सिंघाड़े की फसल करने लगे। फौजी बताते हैं कि सिंघाड़े की बेल नाममात्र के रुपये में मिल जाती है। इसमें लागत नहीं आती, जबकि सिंघाड़ा बाजार में 1200-1300 रुपये प्रति कुंटल बिक जाता है। इससे किसानों को अच्छी आय हो रही है। एक हजार की आबादी वाले इस गांव में आधे लोग अब सिंघाड़े की फसल करने लगे हैं।
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