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जेल की सजा से ‘कड़ी सजा’ है रोटी खाना

Deoria

Updated Thu, 27 Dec 2012 05:30 AM IST
देवरिया। जेल में बंद कैदियों को सजा से बड़ी सजा मिल रही है। जब उनके सामने कच्ची और सूखी रोटियां आतीं हैं तो कैदी मन मसोस कर खाते हैं। इस पीड़ा को कहें तो किससे कहें आखिर सवाल जो पापी पेट का है। ठंड में सबसे ज्यादा सांसत बूढ़े कैदियों की है।
जनपद कारागार में देवरिया और कुशीनगर के कैदी बंद हैं। जेल की क्षमता 530 कैदियों की रखने की है, लेकिन यहां 1200 से अधिक कैदी बंद हैं। इसमें 90 महिला बंदी शामिल हैं। 50 कैदी सत्तर की उम्र पार कर चुके हैं। इसमें पांच सजायाफ्ता हैं। ठंड का आलम यह है कि लोग घरों से बाहर निकलना नहीं चाहते हैं। ऐसे में जेल प्रशासन कैदियों की भारी-भरकम संख्या को देखते समय से पहले भोजन बनवाना शुरू कर देता है। सुबह छह बजे के करीब भोजन बनना शुरू हो जाता है। दोपहर में 12 बजे के करीब कैदियों के सामने भोजन की थाली परोसी जाती है। आलम यह है कि इनमें कुछ रोटियां बेतरतीब जली तो कुछ इतने कच्चे जो दांत में चिपक जाते हैं। सुबह की ये रोटियां जब थाल में पहुंचती हैं तो सूख जातीं हैं। जिनसे बूढ़े इसे खा भी नहीं पाते हैं। यही हाल शाम के भोजन का भी है। सूत्रों ने बताया कि कैदियों की संख्या अधिक होने के कारण आटे को पूरी तरह से गूंथा नहीं जाता है। जिला अस्पताल में दवा कराने आए कुशीनगर के कैदी शारदा सिंह उम्र के अंतिम पड़ाव में हैं। वे बताते हैं कि रोटी का निचला हिस्सा जला तो ऊपरी हिस्सा कच्चा ही रहता है। दाल से पानी का मेल नहीं होता है। रोटी बनने के छह घंटे के बाद वह कैदियों की थाली में आता है। पेशी पर आए बालकुंवर और धूमन का कहना है कि रोटी सूखी होने के कारण उसे खा भी नहीं पाते हैं। एक दशक से जेल में बंद हैं, लेकिन रोटी में कोई बदलाव नहीं देखने को मिला। राम भरोसे प्रसाद और बिना हाथ के कैदी मधुसूदन गौंड का कहना है कि जेल का खाना गरीबों के लिए कष्टदायी है। अमीर कैदी तो सिपाहियों से मिलकर गर्म रोटियां बनवा लेते हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जेल में करीब पांच कुंटल आटा प्रतिदिन लगता है। मानक यह है कि काम करने वाले कैदियाें को 3.50 ग्राम आटा और बिना काम करने वालों को 2.70 ग्राम प्रति के हिसाब से मिलना चाहिए, लेकिन चार सूखी रोटियां ही उन्हें नसीब होतीं हैं।
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