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गन्ना समर्थन मूल्यः लागत और लाभ में बढ़ती खाई

Deoria

Updated Sun, 09 Dec 2012 05:30 AM IST
रुद्रपुर। किसान सियासत में वर्चस्व बनाए रखने के लिए राजनीतिक पार्टियाें में मची होड़ से चार साल के भीतर गन्ने का समर्थन मूल्य दो गुना बढ़ गया। बावजूद इसके यह जरूरत के मुकाबले काफी कम है। सपा सरकार द्वारा घोषित नए गन्ना मूल्य से किसानों ने राहत तो महसूस की है पर एक असंतोष भी है।
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2007-08 में बसपा के सत्तासीन होने के समय गन्ने का समर्थन मूल्य 125-130 रुपए प्रति क्विंटल था। गन्ना किसानों पर मेहरबानी दिखाते हुए बसपा सरकार ने वर्ष 2009-10 में गन्ने के समर्थन मूल्य में 25 रुपये इजाफा किया। 2011-12 में तत्कालीन सरकार में गन्ना मूल्य 240-250 रुपये क्विंटल बढ़ गया और साथ ही बकाया रुपया भी किसानाें को मिल गया। सपा सरकार से उम्मीद रखे किसानाें को खुशी मिली और अखिलेश सरकार ने गन्ना के समर्थन मूल्य में 40 रुपये की बढ़ोतरी कर किसानों पर अपनी छाप छोड़ने का पूरा प्रयास किया है। किसान अजय तिवारी ने कहा कि सपा सरकार की घोषणा से किसानों को महंगाई में थोड़ी राहत मिलेगी। रामसमुझ ने कहा कि समर्थन मूल्‍य में बढ़त महंगाई के मुकाबल काफी कम है। गन्ना किसान देवराज, रामकल्प, शिवराज, भभूति यादव आदि ने कहा कि सरकार को महंगाई को देखते हुए मूल्य बढ़ाना चहिए था।
घोषित गन्ना मूल्य किसानों के साथ नाइंसाफी
भाटपाररानी। प्रदेश सरकार ने चालू पेराई सत्र के लिए गन्ना समर्थन मूल्य 275 से 290 रुपये घोषित कर दिया। महज 40 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोत्तरी होने पर विभिन्न राजनैतिक दलों के लोगों और किसान प्रतिनिधियों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। प्रतापपुर केन यूनियन के चेयरमैन डा. जगरनाथ सिंह ने घोषित गन्ना मूल्य पर असंतोष जताते हुए कहा कि खाद, बीज, डीजल और मजदूरी चार्ज के हिसाब से यह बहुत कम है। भाटपाररानी केन यूनियन के चेयरमैन दान बहादुर सिंह का कहना था कि पेराई सत्र के दो माह बाद गन्ना मूल्य घोषित करना किसानों के साथ विश्वासघात है। यह गन्ना मूल्य किसानों के लिए कुछ भी नहीं है। माकपा नेता साधुशरण, जयप्रकाश यादव ने कहा कि यह किसानों के साथ धोखा है। प्रदेश सरकार किसानों की हितैषी बनती है। गन्ना मूल्य घोषित होने के बाद प्रदेश सरकार का असली चेहरा उजागर हो गया। गन्ना किसान रामबली सिंह, धर्मू प्रसाद, लालबाबू सिंह, जगदीश यादव ने इस मूल्य वृद्धि को बहुत कम बताते हुए कहा कि प्रदेश सरकार को गन्ने का समर्थन मूल्य 350 रुपये करना चाहिए। क्योंकि किसानों की हालत पहले से खराब है। इस पर गन्ने के मूल्य में मामूली वृद्धि से कुछ खास राहत नहीं मिलने वाली।
साल दर साल गन्ना रेट
वर्ष सरकार रेट रुपये में
1999-2000 भाजपा 85-90
2000-01 भाजपा 90-95
2001-02 भाजपा 95-100
2002-03 बसपा 95-100
2003-04 बसपा 95-100
2004-05 सपा 107-112
2005-06 सपा 115-120
2006-07 सपा 125-130
2007-08 बसपा 125-130
2008-09 बसपा 140-145
2009-10 बसपा 165-170
2010-11 बसपा 205-210
2011-12 बसपा 240-250
2012-13 सपा 280-290
अखिलेश यादव ने मायावती को पछाड़ा
सलेमपुर। गन्ने के समर्थन मूल्य को लेकर चल रही सियासी दौड़ में सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पूर्ववर्ती मायावती सरकार को पछाड़ दिया। उन्होंने पिछली बसपा सरकार में 35 रुपये से पांच रुपये ज्यादा 40 रुपये बढ़ाकर अब तक का सबसे ज्यादा रेट घोषित किया है। हालांकि खाद, बीज, सिंचाई और लेबर चार्ज में वृद्धि को देखते हुए किसान इसे काफी कम बता रहे हैं।
भाजपा की सरकार ने वर्ष 1999 से 2002 के बीच तीन सालों में महज 10 रुपये की मामूली वृद्धि की थी। इसके बाद वर्ष 2002 से 2004 तक बसपा सरकार में एक रुपये की वृद्धि नहीं हुई। वर्ष 2004 से 2007 तक सत्ता में रही मुलायम सरकार ने तीन साल में गन्ने के मूल्य में महज 18 रुपये की बढ़ोत्तरी की थी। पिछली बसपा सरकार ने वर्ष 2007-08 में सत्तासीन होने के बाद पहले वर्ष गन्ने के मूल्य में कोई वृद्धि नहीं की। लेकिन विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पेराई सत्र 2011-12 में गन्ने के रेट में एकमुश्त 35 रुपये की वृद्धि करके किसानों को रिझाने का भरपूर कोशिश की। सूबे के मुखिया अखिलेश यादव ने पहले ही वर्ष में 40 रुपये की बढ़ोत्तरी कर लोकसभा चुनाव की तैयारी में एक बड़ा कदम बढ़ा दिया। इसके पूर्व वर्ष 1999-2000 में भाजपा ने 85-90 रुपये की बढ़ोत्तरी की। यानि 13 वर्षों में अब तक गन्ने का दाम करीब तीन गुना ही बढ़ा है। इन सबके बावजूद यह बढ़त खाद, बीच और सिंचाई के खर्च के मुकाबले काफी कम है।
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