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स्कूल बस नहीं कर रहे हैं सुरक्षा के मानक पूरा

Deoria

Updated Sat, 13 Oct 2012 12:00 PM IST
देवरिया। बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए विद्यालयों में चल रहे बसों की स्थिति जर्जर है। बच्चों के सुरक्षा को लेकर अभिभावक चिंतित हैं। ट्रैफिक लोड के चलते आए दिन दुर्घटनाएं हो रहीं हैं। स्कूल से बच्चों के घर पहुंचने तक वे सड़क की तरफ टकटकी लगाए रहते हैं। विद्यालयों में चल रहे वाहन परिवहन के मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं। परिवहन सचिव ने संभागीय अधिकारियों को पत्र भेजकर सुरक्षा मानक को पूरा कराये जाने की सख्त हिदायत दी है। इस आदेश को विभाग भी ठंढे बस्ते में डाल रखा है। स्कूलों से बच्चों के आने जाने को लेकर अभिभावक काफी चिंतित हैं। उनके समक्ष सबसे जटिल समस्या बच्चों को स्कूल भेजने और लाने की है। लोगों की व्यस्तता इतनी बढ़ गई है कि वे बच्चों को खुद स्कूल नहीं पहुंचा सकते। शहर के स्कूलों में अधिकांशत बसों की हालत जर्जर हैं। ये बसें समय से बच्चों को स्कूल पहुंचा पाएंगी की नहीं इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। शहर में करीब एक दर्जन कान्वेंट विद्यालय ऐसे हैं जहां बच्चों को स्कूल पहुंचाने के बस की सुविधा मुहैया कराई गई। बस के नाम पर अभिभावकों से मोटी रकम भी वसूली जाती हैं। लेकिन बच्चों को बसों में खड़ा होकर ही जाना पड़ता है। जर्जर बसें कब बीच में खराब हो जाएंगी। इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। समय की बाध्यता के चलते बस चालक तेज गति से बस चलाते हैं। स्कूल बस के नाम पर इन्हें कोई रोक-टोक भी नहीं करता है। दो तीन विद्यालयों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश विद्यालय वाहन सेवा के नाम पर अभिभावकों का शोषण कर रहें हैं। कुछ विद्यालयों में तो वाहन सुविधा न होने के बावजूद बाहरी वाहनों को बच्चों को स्कूल पहुंचाने की छूट दी गई है। इन वाहनों की भी दशा ठीक नहीं है।
समय न मिलने के चलते चलते बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए वाहन सुविधा जरूरी है। विद्यालय इसके लिए जितना शुल्क निर्धारित है उसे दिया जाता है लेकिन बसों में बच्चों के बैठने की सुविधा नहीं मिलती है। वे अधिकांशत: खड़े होकर ही आते जाते हैं, सिर में चोटें लग जाती है। यह बात जब वह घर आकर कहते हैं तो उस समय दिमाग झल्ला जाता है।
अरविंद गुप्ता, वरिष्ठ अधिवक्ता
स्कूल के बसों में जो चालक रखे गए हैं उसमें अधिकांशत: अनट्रेंड हैं। इस स्थिति में बच्चों को बस से भेजने में बहुत ही डर लगता है। पहले वे बस से ही बच्चों को स्कूल भेजते थे लेकिन अब वे खुद पहुंचाने का कार्य करते हैं। कभी-कभी लड़का साइकिल से भी विद्यालय चला जाता है। फिलहाल प्रशासन को इस मामले में सख्ती से कार्रवाई करनी चाहिए।
ओमप्रकाश शर्मा, परशुराम चौक
मेरा भतीजा सोंदा स्थित एक विद्यालय में पढ़ता है। वह बस से घर जाता है। स्कूल तो नौ बजे से चलता है लेकिन बस साढे़ सात बजे ही आ जाती है। ऐसे में समय की परेशानी होती है। कई बार बस खराब हो जाने से उन्हें स्वयं स्कूल पहुंचाना पड़ता है। कभी बस पहले आ जाती है तो कभी विलंब से आती है। इसके चलते काफी दिक्कतें होती है।
कमलेश निवासी गोबराई
मेरी बेटी एक कान्वेंट विद्यालय में पढ़ती है। बस से आती-जाती है। पढ़ाई तो स्कूल में छह घंटे ही होती है लेकिन बेटी को बस से जाने और घर आने में करीब नौ घंटे का समय लग जाता है। पूरा शहर भ्रमण कराते हुए बस स्कूल ले जाता है और उसी तरह जगह-जगह बच्चों का उतारने के बाद घर लाता है।
श्रीमती किरण सिंह, भुजौली कालोनी
ये हैं मानक
बस के आगे-पीछे स्कूल बस अंकित होना चाहिए, बस में चालक के अलावा एक अनुभवी पुरुष या महिला की तैनाती होनी चाहिए, जो बच्चों को संभाल सकें, अनुबंधित बसों पर आन स्कूल ड्यूटी लिखा होना चाहिए, बसों का रंग पीला हो, जिसमें गोल्डन अथवा नीली लाइनिंग हो, बस के आगे-पीछे दोनों तरफ स्कूल का नाम और फोन नंबर लिखा होना चाहिए, बस में बच्चों का नाम, पता, ब्लड ग्रुप और कक्षा की सूची अनिवार्य रुप से लगी होनी चाहिए, सीएनजी वाहनों की त्रैमासिक जांच अनिवार्य रुप से हो, बसों में गति नियंत्रक यंत्र लगे होने चाहिए, अधिकृत सवारी संख्या के डेढ़ गुने से ज्यादा बच्चे न हों, चालक का वाहन चलाने का लाइसेंस न्यूनतम पांच साल पुराना हो, बस की खिड़की से बच्चे अपना सिर बाहर न निकालें इसके लिए राड लगा होना चाहिए।
स्कूल बसों के लिए बनाए गए सुरक्षा मानकों की जांच समय-समय पर की जाती है। अभी दो माह पहले एक बस को चालान किया गया था। स्कूलों को नई गाइड लाइन भेजी जाएगी। इसके बाद यदि वे इसका पालन नहीं करते हैं तो बसों का चालान किया जाएगा। मानक पूरा न करने वाले विद्यालयों का बस संचालन नहीं होगा।
ओपी सिंह, आरटीओ देवरिया
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