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सड़क से लेकर सदन तक संघर्षों की लंबी दास्तान

Deoria

Updated Mon, 17 Sep 2012 12:00 PM IST
सलेमपुर। साधारण किसान परिवार में पैदा हुए हरिकेवल प्रसाद ने कम पढ़ाई-लिखाई के बावजूद अपने संघर्षों के बलबूते जो ऊंचाई हासिल की इससे वह सदा याद किए जाएंगे। जुझारू तेवर और जनता के सवालों पर लड़ाई लड़ने वाले हरिकेवल प्रसाद का स्थान इतनी आसानी से नहीं भरा जा सकता। युवा पीढ़ी के लिए उनकी संघर्ष गाथा अनुकरणीय होगी। आज का राजनीतिक परिवेश जहां धनबल एवं बाहुबल पर चल रहा है वहीं हरिकेवल प्रसाद जनबल के सहारे इतनी ऊंचाई पर पहुंचे थे। संघर्ष के लंबे सफर में सलेमपुर एवं बलिया की सरजमीं पर उनके कद्रदानों की लंबी फेहरिस्त है।
गंवई पृष्ठभूमि से जुड़े हरिकेवल इस ऊंचाई तक पहुंचने के बाद भी अपने अतीत को नहीं भूले थे। देश की राजनीति में उच्च घरानों और पढ़े लिखे लोगों की अपेक्षा कम पढ़े-लिखे हरिकेवल ने अपने सादगीपूर्ण जीवन एवं जनता से नजदीकियों की बदौलत अपनी मंजिल हासिल करते रहे। खेलने कूदने की उम्र में ही उन्होंने अपना जीवन सामाजिक संघर्षों के लिए समर्पित कर दिया था। बाद में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोहर भाई और समाजवादी नेता उग्रसेन सिंह जैसे लोगों के संपर्क में आने के बाद उनसे काफी कुछ सीखा। वर्ष 1967 से राजनीति की पारी शुरू करने वाले हरिकेवल प्रसाद ने मझौलीराज के राजा अवधेश प्रताप मल्ल को कड़ी टक्कर देकर अपने आगाज का संदेश तो दिया लेकिन हार का सामना करना पड़ा। यहीं नहीं बाद में रामनगीना मिश्र, छोटे लोहिया के नाम से मशहूर जनेश्वर मिश्र, कांग्रेस के कद्दावर नेता डॉ. भोला पांडेय, हरिवंश सहाय जैसे दिग्गजों को मात देकर लोकसभा के गलियारे में अपनी मजबूत धमक दिखाई थी। सड़क से लेकर सदन तक जनता से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर उनकी लड़ाई मरते दम तक चलती रही।
1967 एवं 1969 के विधानसभा चुनाव में उनके काफी करीबी रहे पूर्व विधायक सुरेश यादव कहते हैं कि हरिकेवल के निधन से एक युग का अंत हो गया। संघर्ष की कोख से पैदा हुए हरिकेवल ने जनता के सवालों पर संघर्ष करते हुए राजनीति की ऊंचाई तय की। ऐसे जुझारू तेवर वाले व्यक्तित्व का राजनीति में मिलना अब दुर्लभ है। बता दें कि वर्ष 1998 में समता-भाजपा गठबंधन से लड़े हरिकेवल प्रसाद ने बसपा उम्मीदवार रहे सुरेश यादव को पटखनी देकर जीत दर्ज की थी।
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