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बाजार हुआ बेजार, समस्याएं अपरंपार

Deoria

Updated Mon, 10 Sep 2012 12:00 PM IST
बरहज। एक जमाने से लोगों को छोटी से बड़ी आवश्यकताएं पूरा करने वाला बरहज बाजार समस्याओं की बाढ़ के साथ बेजार हो गया है। जिसके चलते व्यापारियों का उत्साह ठंडा पड़ रहा है। वहीं ग्राहक खस्ते हालत के चलते छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए तरसने लगे हैं।
नगर की आबादी बढ़ने के साथ ही बाजार का दायरा सिमटने लगा है। ग्राहक बढ़ते गए, सुविधाएं बढ़ाने की कोई योजना नहीं बनी। कभी पुलिस चौकी के करीब पुल के नीचे से हनुमानगढ़ी तक बाजार की रौनक थी। अब वहां सिर्फ नाम भर की दुकानें हैं। बाजार अब मुख्य चौक से लेकर स्टेट बैंक तक ही मुख्य रूप से रह गई है। पैना रोड पर शराब की दुकानों के चलते अन्य दुकानें मारी गईं। वहीं रुद्रपुर रोड पर मांस, मछली की मंडी होने के कारण मतलब न रखने वाला ग्राहक जाना नहीं चाहता है। चौक से उत्तर बस स्टैंड तक की पूरी सड़कें वाहनों के अतिक्रमण के चलते जाम रहती हैं। जिससे यहां के व्यवसाय बर्बाद हो गए हैं।
नगर के मुरारी अग्रवाल कहते हैं कि सड़कों की पटरियों पर फैली दुकानें व खड़े बेतरतीब वाहन ने सूरत बिगाड़ दी है। आवागमन के साथ अतिक्रमण भी समस्या का एक प्रमुख कारण है। आलोक जायसवाल व रामकेवल गुप्ता बताते हैं कि गलियों से पहले लोग निकलते थे, अब वाहन भी निकलते हैं। इससे वहां भी चलना मुश्किल हो गया है। पटरियों पर पांव फैलाए ठेले वाले भी बाजार को मुसीबत में डालने में पीछे नहीं हैं। सावित्री राय कहतीं हैं कि बाजार आने के बाद न तो पीने के पानी की बेहतर व्यवस्था है न ही प्रसाधन की। इससे महिलाएं भी बाजार आने से हिचकतीं हैं। बच्चों का स्कूल जाना और लौटना मुश्किलों से भरा है। बिना नियम के खड़े वाहन व रफ्तार भरी ट्रैफिक बच्चों के अभिभावकों में डर पैदा करती है।
वहीं, नगरपालिका अध्यक्ष अजीत जायसवाल का कहन है कि नगर की सूरत अतिक्रमण से बिगड़ी है। कब्जेदारों को अपना कब्जा हटा लेने की सूचना दे दी गई है। अब कार्रवाई होगी।
बाजार में बसने की ललक से बढ़ी मुसीबत
नौकरी, व्यवसाय के वास्ते आए व आसपास के गांवों में रहने वाले बहुत से लोगों ने पिछले दस वर्षों के भीतर नगर में अपना ठौर बना लिया है। ज्यादा संख्या में मकान बने जिसके चलते कई कालोनियां बस गईं। वर्ष 2001 में हुई जनगणना में नगर में लगभग तीन हजार मकान एवं आबादी 29793 थी। दस वर्ष की रेस के बाद वर्ष 2011 में जनसंख्या 35,285 के साथ आशियाने बढ़कर 4581 हो गए। भीड़ का दायरा बढ़ता गया, सड़कों के साथ संसाधन व बाजार ज्यों का त्यों बने रहे। आबादी बढ़ने के बाद अतिक्रमण कम नहीं बढ़ता ही गया।
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