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तो आंकड़ों में बाजीगरी कर रहा स्वास्थ्य विभाग!

Deoria

Updated Fri, 13 Jul 2012 12:00 PM IST
रुद्रपुर। जेई का सरकारी आंकड़ा आधी हकीकत और आधा फंसाना बन गया है। जेई का रेड जोन घोषित हुए इस इलाके में स्वास्थ्य विभाग के अनुसार बीमारी नाममात्र ही है जबकि मौके की हकीकत कुछ और ही है। दरअसल, विभाग प्राइवेट नर्सिंगहोम में इलाज या मौत होने की दशा में मरीज का नाम रिकार्ड में दर्ज नहीं कर रहा है। नतीजतन, बीमारी से पीड़ित लोगों की संख्या कम दिख रही है जबकि खुद विभाग की 2011 की रिपोर्ट के मुताबिक औसतन हर गांव में दो से तीन लोगों की मौत हुई है। पिपरा कछार गांव में ही दो साल में जेई से पांच की मौत हुई। इनमें से सिर्फ एक का नाम रिकार्ड में दर्ज है। आंकड़ों में आई इस कमी के आधार पर विभाग ने जेई प्रभावित इन 31 गांवों में बचाव के उपाय इस साल नहीं किए हैं।
केस एक : 36 वर्ष के महमूद की मौत बीते 17 जून को हो गई। उसकी मां कुसुम देवी ने बताया कि तबीयत बिगड़ने पर हम लोग सरकारी अस्पताल में गए। डाक्टरों ने जिला अस्पताल भेज दिया। जिला अस्पताल के बड़े डाक्टर ने कहा कि नवकी बीमारी हो गई है मेडिकल कालेज में इलाज होगा। मेडिकल कालेज जाने की बजाय महमूद के परिजन उसे बड़हलगंज ले गए। वहां उसकी मौत हो गई। महमूद का नाम सरकारी दस्तावेजों में दर्ज नहीं है।
केस दो: अरबाज की मौत 29 जून को हुई। बीमारी के सारे लक्षण जेई के थे। उसके पिता जाफर ने बताया कि बेटे की मौत नवकी बीमारी से हुई। बड़हलगंज में जिस डाक्टर के यहां इलाज करा रहा था उसने बीमारी का नाम जापानी इंसेफेलाइटिस बताया था। अरबाज का नाम भी रिकार्ड में नहीं है।
केस तीन: मदनलाल पुत्र शिवनरायण उम्र 15 वर्ष, भी जेई से पीड़ित था। उसकी जान तो बच गई लेकिन मानसिक रोगी बनकर जिंदा है। मां कमलावती ने बताया कि इलाज गोरखपुर के प्राइवेट नर्सिंग होम में कराया। सरकारी दस्तावेजों में मदनलाल से संबंधित कोई जानकारी नहीं है।
केस चार: पूजा पुत्री दिलीप पासवान उम्र 6 वर्ष गोरखपुर के निजी नर्सिंग होम में बीते वर्ष जेई से मरी। पिता दिलीप ने बताया कि डाक्टर ने मौत कारण जेई बताया था। पूजा का नाम भी जेई मृतकों में नहीं है।
केस पांच: ऋषिदेव पुत्र रामदेव उम्र 13 साल निवासी पिपरा कछार, ऋषिदेव की मौत जुलाई 2011 में मेडिकल कालेज गोरखपुर में हुई। इसका नाम सरकारी रजिस्टर में जेई से मरने वालों की सूची में दर्ज है।
केस छह: संजय पुत्र रामकृपाल उम्र 14 साल दो साल पहले जिला अस्पताल ले जाते समय रास्ते में दम तोड़ दिया। रुद्रपुर सरकारी अस्पताल के डाक्टर जेई बता कर जिला अस्पताल भेजे। अस्पताल में जेई से मौत का कोई रिकार्ड मौजूद नहीं है।
घोषित है रेड जोन
सन् 2011 में जिला अस्पताल के एक सर्वे के बाद रुद्रपुर के 31 गांवों को जेई से प्रभावित बताया गया। इसमें हर गांव में औसतन जेई के दो से तीन मरीज मिले थे और इतनी ही मौतें हुई थीं। स्वास्थ्य विभाग ने बरसात के पहले छिड़काव, मच्छरदानी वितरण आदि का निर्देश दिया था।
सीएचसी और पीएचसी को जेई प्रभावित गांवों में छिड़काव करने और उनकी निगरानी रखने का कड़ा निर्देश दिया गया है। जहां तक रिकार्ड की बात है तो जिन लोगों का मेडिकल कालेज या सरकारी अस्पताल में इलाज होता है उन्हीं का नाम दर्ज किया जाता है।
डा. एएन तिवारी , सीएमओ
जेई से मरने वालों का ब्योरा जिला अस्पताल से आता है। जिन मरीजों की मौत मेडिकल कालेज या जिला अस्पताल में होती है उनका रिकार्ड तो मिल जाता है, पर निजी चिकित्सालयों में मरने वालो की प्रमाणिकता संदिग्ध मानी जाती है। रुद्रपुर में जेई का 31 गांवों में प्रभाव है। यहां एहतियात बरतने का निर्देश दिया गया है।
डा. एसएन शर्मा, अधीक्षक , सीएचसी


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