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‘हिंदू ही नहीं अन्य धर्मों में भी पुनर्जन्म की व्याख्या’

Chitrakoot

Updated Fri, 05 Oct 2012 12:00 PM IST
पितृ पक्ष पर गायत्री शक्तिपीठ के संचालक ने श्राद्ध कर्म का बताया
चित्रकूट। पितृ पक्ष शुरू होने पर लोग अपने पूर्वजों को तर्पण कर रहे हैं। गायत्री शक्तिपीठ के संचालक डा. रामनारायण त्रिपाठी ने पितृपक्ष और श्राद्ध कर्म का महत्व बताते हुए कहा कि हिंदू संस्कृति ही नहीं अन्य धर्मों में भी पुनर्जन्म की व्याख्या की गई है।
त्रिपाठी ने बताया कि हिंदू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है और उसके सर्वमान्य ग्रंथ वेद हैं, जिसके अंग-उपांग, शात्र दर्शन, उपनिषद, पुराण आदि हैं। सभी में पुनर्जन्म की एवं परलोक की बात स्वीकार की गई है। बताया कि शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में सभी लोकों का वर्णन है और इसमें भी पितृलोक का वर्णन आता है, जिसमें मनुष्यों के पितृगण निवास करते हैं जिसके स्वामी यमराज हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रश्न सदैव उठता रहा है और उठता रहेगा कि मरने के बाद हमारा क्या होता है? क्या आत्मा अमर है? गीता में भगवान ने अपने और अर्जुन के अनेक जन्म होने की बात कही है। भगवान ने आत्मा के बारे में कहा है- न जायते न मृयते कदाचन। आत्मा न कभी जन्म लेती है और न मरती है। शरीर मरता है और आत्मा अपने कर्मों के अनुसार इच्छित लोक की यात्रा करती है। कुछ काल के विश्राम के बाद कर्मफल भोगने के लिए उसके अनुरूप वातावरण में जन्म लेकर सुख दुख की परिस्थितियों में रहना पड़ता है। बताया कि आदि शंकराचार्य ने भी कहा था कि यह क्रम अनंतकाल तक चलता रहता है। जब आत्मा ईश्वर स्मरण करते हुए संपूर्ण कर्मफलों का नाश कर लेती है तब मुक्त होकर ईश्वर में विलीन हो जाती है। वृहदारण्यक उपनिषद में भी पुनर्जन्म के बारे में बताया गया है कि एक कीड़ा एक पैर उठाता तभी है जब उसे दूसरा पैर रखने का आश्रय मिल जाता है, इसी प्रकार आत्मा भी प्रथम शरीर का त्याग तभी करती है जब नवीन शरीर धारण की व्यवस्था हो जाती है। कहा कि जिन घरों में पितृगणों का श्राद्ध नहीं होता उनके पितृगण कुपित होकर चले जाते हैं, ऐसी मान्यता है। बताया कि सभी पुुरुषों और महिलाओं का श्राद्ध उनके दिवंगत होने वाली तिथि को करना चाहिए। किसी कारण से तिथि में न हो सके तो सभी पुरुषों को अमावस्या और महिलाओं का नवमी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए। बताया गायत्री शक्तिपीठ में श्राद्ध तर्पण की व्यवस्था है और कोई भी श्रद्धालु इसका लाभ नि:शुल्क उठा सकते हैं।

पितृ पक्ष के दौरान बुंदेलखंड में महबुलिया की प्रथा है। इसमें बच्चे कांटे में फूल लगाकर पूजा करते हैं और बाद में इन फूलों को किसी कुंआ, बावली, तालाब या नदी में विसर्जित कर देते हैं। गांवों में कुंवारी कन्याओं में यह त्योहार लोकप्रिय है पर शहरों में अब यह प्रथा इक्का-दुक्का जगहों पर दिखती है। बुजुर्ग बताते हैं कि महबुलिया दाई की याद में यह पर्व मनाया जाता है और पूरे पितृ पक्ष चलता है।
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