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भगवान राम ने खुद किया था यहां पर यज्ञ

Chitrakoot

Updated Wed, 29 Aug 2012 12:00 PM IST
झालरियापीठ के बारे में कहा जाता है कि इसका वर्णन वाल्मिकी रामायण में भी है। उसमें प्रसंग है कि भगवान राम ने 1000 यज्ञ किए थे। इनमें से एक यज्ञ भगवान राम ने सीता जी के साथ मरुभूमि में किया था। भगवान राम ने जब समुद्र की प्रार्थना करने के बाद न मानने पर बाण चढ़ाया था तो समुद्र ने पार उतरने का उपाय बताया। इस पर श्रीराम ने जो बाण छोड़ा वह जमीन मरुस्थल में बदल गई। उसका ऋण उतारने के लिए भगवान ने यह यज्ञ किया था। उस यज्ञ से पवित्र हुई जमीन पर कई संत व आचार्य तपस्या करने लगे। संतों व आचार्य की तपोभूमि से यह स्थान पवित्र हो गया। यहां पर संत भगवान को यजमान मानकर यज्ञ कराते आ रहे हैं। कालांतर में इस स्थान पर हरिनारायण जी महाराज संतों के प्रधान आचार्य थे। भगवान ने उन्हें दृष्टांत दिया कि आप मुझे प्रतिष्ठित करें और अर्चा विग्रह का महत्व कलियुग में सबको बताएं। भगवान के इस आदेश को मानकर हरिनारायण जी महाराज ने विशाल भंडारा व यज्ञ किया। समापन पर साक्षात राम जानकी को दाहिने लिए हुए प्रकट हुए। भगवान का सीता जी का दाहिने वाला यज्ञस्वरूप का विग्रह का इकलौता मंदिर झालरिया पीठ में है। हरिरामाचार्र्य जी महाराज ने इसे यहां पर विराजमान किया। तभी से परंपरास्वरुप झालरिया पीठाचार्यों ने पुरुषोत्तम मास के अवसर पर उसी परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं और इसी क्रम में चित्रकूट में भी 144 कुंडीय विशाल यज्ञ का आयोजन किया गया। झालरिया पीठ उत्तर भारत की सबसे बड़ी गद्दी है। इसके देश विदेश में कई आश्रम हैं। इसके उत्तराधिकारी ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले ही होते हैं। वर्तमान स्वामी रामानुजाचार्य घनश्यामाचार्य जी महाराज दास हनुमान आश्रम में रहकर तपस्या करते हैं। बालमुकुंदाचार्य जी महाराज के जमाने में राजस्थान के बांगड़ परिवार का यश काफी फैला। आचार्य श्रीधराचार्य जी महाराज तो काफी सरल स्वभाव के थे। स्वामी जी महाराज अपने गुरु के नाम पर ही कोई काम करते हैं। उन्हीं के नाम पर दास हनुमान देव स्थान का नाम भी श्रीधर धाम रखा है। घनश्यामाचार्य जी जब भी खाली होते है ज्यादातर समय चित्रकूट में दास हनुमान में ही बिताते हैं। बताया कि रामानुज संप्रदाय की आदि गुरु लक्ष्मी जी हैं। इसी वैष्णव परंपरा से ही भगवान को प्राप्त किया जा सकता है।
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