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आजादी के बाद पाया कम और खो काफी कुछ दिया

Chitrakoot

Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
आजादी के दीवानों के मन में है व्यथा
चित्रकूट। स्वतंत्रता दिवस आजादी के दीवानों की सफलता पर जशभन मनाने का अवसर लेकर आता है। लेकिन यह विचार करने योग्य प्रश्न है कि क्या इसी तरह की आजादी के लिए स्वतंत्रता सेनानियों और सैनिकों ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी? देश के लिए अपना सर्वस्व लुटाने वाले लोग जब आज के भारत को देखते हैं तो उनकी आत्मा रो पड़ती है। अमर शहीदों, उनके स्मारकों और उनके परिजनों को केवल स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर याद किया जाता है। जनपद के मऊ कस्बे के निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भुवनेश्वर प्रसाद शुक्ला मानते है कि आजादी के बाद देश ने कम पाया और काफी कुछ खोया। जहां आजादी के बाद आर्थिक समृद्धि आई है वहीं हमने अपना चरित्र खो दिया।
आजादी की बात करते ही भुवनेश्वर प्रसाद शुक्ला की निगाहें चमक उठीं। उन्होंने बताया कि कक्षा 4 की पढ़ाई छोड़कर वह कांग्रेस का काम करने लगे थे। सन 1941 में जब गांधी जी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन की घोषणा की तो उन्होंने जिलाधिकारी बांदा को नोटिस भेजा कि वह अपने गांव में 24 घंटे के बाद नारे बाजी करेगे। इस पर डीएम ने गिरफ्तार करा लिया। उन्हें एक साल की सजा व तीस रुपए का जुर्माना हुआ था। पहले पच्चीस दिन बांदा जेल बाद में किशोर होने के नाते उन्हें 25 मई 1941 को 600 किशोराें को बस्ती के किशोर बंदी गृह में भेजा गया। 24 दिसंबर को गांधी जी का अंग्रेज सरकार से समझौता हो जाने से रिहा कर दिया गया। इसके बाद 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो, करो या मरो का नारा गंाधी जी ने दिया। 23 सितम्बर 1942 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसमें उन्हें दो मामलों में एक साल की सजा व 20 रुपए जुर्माना व दूसरे मामले में छह माह की सजा व बीस रुपए का जुर्माना हुआ था। जुर्माना न भरने से उन्हें 14 माह जेल में गुजारने पड़े थे। बाद में कांग्रेस की सरकार बनने पर जेल में बंद होने वालों के जुर्माने की राशि वापस कर दी गई। बेराउर निवासी रामकृपाल पांडे की बूढ़ी आंखों में आजादी का दृश्य मानो आज भी हिलोरें लेता है। वह बताते है कि उनको अंग्रेज जिलाधिकारी के आवास में तोड़फोड़ करने की कोशिश पर दो साल तक आगरा सेंट्रल जेल में रखा गया था। इस दौरान 18 दिन की भूख हड़ताल में बेतों की सजा मिली थी।

खुशी की लहर दौड़ गई...
भुवनेश्वर शुक्ला बताते हैं कि आजादी की घोषणा के बाद पंद्रह अगस्त की सुबह देश में जश्न का माहौल छा गया। मऊ गांव में भी आजादी की सुबह खुशी की लहर दौड़ गई। कस्बे में लोगों ने एक दूसरे से इसकी चर्चा और खुशी बांटते रहे। उनकी पत्नी शांति देवी से अनुभव के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि उनकी शादी तो 1956 में हुई थी। बताया कि इनकी पहले तो आवारा लोगों में गिनती होती थी शादी की तो चर्चा ही नहीं होती थी। रामकृपालजी ने कहा कि जब आजादी मिली तो पहले दिन ऐसा लगा कि सब कुछ मिल गया। लोगों को गरीबी, भुखमरी और शोषण से छुटकारा मिल सकेगा ऐसी आशा थी पर अब सब कुछ बदल गया, मायूसी छा गई है।


अन्ना व रामदेव में प्रतिबद्धता का अभाव
देश में भ्रष्टाचार व कालाधन पर आंदोलन छेड़ने वाले अन्ना हजारे और रामदेव के बारे इन स्वतंत्रता सेनानियों का कहना था कि अन्ना आंदोलन में प्रतिबद्धता का अभाव दिखा। उन्होंने बताया कि गांधी जी से आगे निकलने को आतुर अन्ना में सत्याग्रह करने का सही तरीका नही अपना सके। रामदेव तो एक पार्टी के विरोध में राग अलाप रहे हैं। उन्होने कहा कि बाबा रामदेव को बेइमानों और भ्रष्टाचारियों का विरोध करना चाहिए था लेकिन वह उन्हीं को मंच पर लाए जिन्होने संसद में लोकपाल लाने का विरोध किया था। हर पार्टी में बेइमान भी हैं और ईमानदार भी, अत: केवल एक पार्टी को निशाना बनाने से आंदोलन को अपेक्षित सफलता नही मिल सकी।


कहानी एकअमर शहीद की
जिले के सीतापुर कस्बे के इंडो चाइना युद्ध 1962 के अमर शहीद गोविंद प्रसाद सोनी का एक स्मारक उनके घर के पास बना है। उनके छोटे भाई गोविंद प्रसाद सोनी ने बताया कि वह 19 वर्ष की उम्र में झांसी बटालियन मेें भर्ती हुए थे। भर्ती के समय ही चीन की लड़ाई हुई थी इसमें पूरी की पूरी बटालियन ही मारी गई थी। बताया कि उनके परिवार के लोग ही पंद्रह अगस्त और 26 जनवरी को बडे़ भाई के स्मारक पर इकट्ठा होेते हैं। उन्होने बताया कि पिछली सरकार में उनके लिए स्मारक व चौराहा बनाने पर चर्चा हुई थी लेकिन अभी तक कुछ नही हो सका। कहा कि लगता तो उन्हें यही है कि उनके बड़े भाई ने गलत लोगों के लिए अपना जीवन स्वाहा कर दिया।



... इस आजादी की तस्वीर से मायूस हैं बुजुर्ग
चित्रकूट। आजादी मिली तो पर इसकी वर्तमान तस्वीर बुजुर्गों को निराश करती है। इनका कहना है कि यह वह आजादी तो नहीं, जिसकी कल्पना हमारे वीरों ने की थी। गदाखान (मानिकपुर) निवासी हालमुकाम सदर मुहल्ला कर्वी में रह रहे शंभूराम सिंह ने कहा कि वर्तमान समय की कानून व्यवस्था को देखकर दुख होता है। अंग्रेजों ने हमारा उत्पीड़न और शोषण तो किया पर उस जमाने में कानून व्यवस्था अब से काफी अच्छी थी। आज तो राजनीतिज्ञों ने स्वार्थपरक राजनीति की वजह से जो स्थिति बना ली है, उसकी तो कल्पना भी हमारे वीरों ने नहीं की रही होगी। कर्वी माफी निवासी रेलवे विभाग से वीआरएस प्राप्त श्यामलाल सिंह ने कहा कि आज की स्थिति को देखकर तो रोना आता है। करोड़ों लोगों ने देश के लिए आहुति दी, सब कुछ खो दिया और आज नेताओं ने उसका मखौल उड़ा दिया। बाबा रामदेव की लड़ाई को उन्होंने जायज करार दिया। पहाड़ी निवासी बाबूलाल दीक्षित का कहना था कि आज हमें लगता ही नहीं कि आजादी मिल गई है। हर तरफ भ्रष्टाचार विराजमान है और सही आदमी को कोई पूछने वाला नहीं है।
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