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अभी तक जिले में 136 एड्स रोगी चिह्नित

Chitrakoot

Updated Sat, 16 Jun 2012 12:00 PM IST
हर साल बढ़ रही एड्सरोगियों की संख्या
चित्रकूट। जिले में एड्स रोगियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। हर साल होने वाली काउंसिलिंग और ब्लड सेंपल के नमूनों में इनकी संख्या हमेशा बढ़ी ही मिलती है, जो जिम्मेदारों के लिए चिंता का सबब है। गौरतलब है कि हाल ही में हुई पल्स पोलियो की बैठक में जिलाधिकारी और चिकित्साधिकारियों ने इस मुद्दे पर भी चर्चा की थी और एड्स रोगियों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई थी। जिला अस्पताल में स्थापित स्वैच्छिक परामर्श एवं परीक्षण केंद्र(आइसीटीसी) के आंकड़ों के अनुसार जिले में कुल 136 एड्स रोगी चिह्नित हुए है जिनमें से अब तक कु ल सात एड्स रोगियों की मौत भी हो चुकी है।
यह आंकड़े तो स्वास्थ्य विभाग के पास मौजूद है जिले में इसके कई मरीज तो जानकारी और जांच के अभाव में अपने अंदर इस खतरनाक बीमारी को दूसरों तक फैलाने का कारण बनते हैं। सन् 2007 में जनपद में आईसीटीसी की स्थापना से लेकर अब तक कुल नौ हजार लोगों ने अपने ब्लड सैंपल की जांच कराई जिनमें से 104 से कुल 4 एड्स रोगियों की मौत हो चुकी है। गर्भवती माताओं से बच्चों में एचआईवी को फैलने से बचाने के लिए स्थापित काउंसिलिंग सेंटर प्रीवेंशन आफ पैरेंट्स टू चाइल्ड ट्रांसमिशन (पीपीटीसीटी) सेंटर में 12637 लोगों की काउंसिलिंग के बाद 10757 लोगों ने अपने रक्त की जांच कराई थी इनमें से कुल 32 लोगों के नमूने पाजिटिव पाए गए। इनमें से तीन की अब तक मौत हो गई है। यानि कुल 19 हजार 757 रक्त के नमूने में से 136 लोगों के नमूने एचआईवी पाजिटिव पाए गए और अब तक कुल सात की मौत एड्स से हो चुकी है।
आईसीटीसी के काउंसलर अंजेयन सिंह ने बताया कि उनके यहां सन् 2010-11 में 2683 लोगों ने काउंसिलिंग कराई गई जिनमें से 1828 लोगों को जांच की गई जिनमें से 15 नमूने पाजिटिव पाए गए। 2011-12 में 2673 की काउसिलिंग की गई जिनमें से 2462 ने अपनी जांच कराई इनमें से 15 एचआईवी पाजिटिव पाए गए। 2012-13 में मई तक 81 लोगों के नमूने की जांच कराई गई थी जिसमें से तीन पाजिटिव मरीज पाए गए। महिला अस्पताल में पीपीटीसीटी में 2007-08 में 1165 लोगो की काउंसिलिंग की गई इनमें से 1097 मरीजों ने जांच के लिए नमूने दिए इनमें से 10 मरीज पाजिटिव पाए गए। 2008-09 में 1862 मरीजों की काउंसिलिंग की गई इनमें से 1680 लोगों ने रक्त की जांच कराई इनमें से 9 मरीज एड्स रोगी पाए गए। 2009-10 में 2293 लोगों की काउंसिलिंग कर 2108 नमूने की जांच की गई इनमें से एक भी पाजिटिव नही मिला। 2010-11 में 3017 की काउंसिलिंग कर 1912 की जांच की गई इनमें से चार लोग पाजिटिव मिले। 2011-12 में 3594 की काउंसिलिंग कर 3306 की जांच की गई जिसमें 8 मरीज पाजिटिव मिले। 2012-13 में मई महीने तक 706 की काउंसिलिंग के बाद 654 लोगों ने जांच कराई इनमें से एक पाजिटिव मिला।
पीपीटीसीटी की काउंसलर रेखा शुक्ला ने बताया कि उनके यहां लोगों से रक्त के नमूने की जांच कर रोग की पहचान की जाती है और मरीज को इलाहाबाद स्थित एंटी रिट्रो थिरैपी(आईआरटी) सेंटर से संपर्क कराया जाता है। वहां से उसे मुफ्त में दवा दी जाती है जिससे मरीज की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। उन्होने बताया कि सेंटर से दवा कराने और डाक्टर के अनुसार चलने वाले मरीज अपने जीवन को आसान और अधिक बना सकते

पीड़ित महिला दे सकती है स्वस्थ शिशु को जन्म
महिला काउंसलर ने बताया कि डाक्टरों की देखरेख में गर्भवती का प्रसव होने से बच्चे को एचआईवी से बचाया जा सकता है। बताया कि अभी तीन साल पहले एक गर्भवती महिला की डिलीवरी जिला अस्पताल में कराई गई थी उसके बच्चे का अट्ठारह महीने के बाद टेस्ट कराया गया तो वह बच्चा एचआईवी निगेटिव पाया गया। बताया कि एक और महिला की डिलीवरी कराई जा चुकी है और उसके पुत्र अट्ठारह माह का होने वाला है। उसकी जांच कराई जाएगी।
अधिकतर पीड़ित बाहर रहकर नौकरी करने वाले
आईसीटीसी के दोनों परामर्शदाताओं ने बताया कि एड्स पीड़ित पाए गए अस्सी फीसदी मरीज गरीब तबके के पाए गए हैं। यह सभी ज्यादा समय तक परिवार से दूर रहते हुए सूरत, दिल्ली व नागपुर आदि स्थानों पर नौकरी करते हैं। जानकारी के अभाव में ये सभी असुरक्षित यौन संबंध कायम करते है और अपने साथ एड्स जैसी गंभीर बीमारी लेकर आते है वही बीमारी उनके पार्टनर में फैल जाती है। उन्होंने बताया कि दवा लेने से एड्स रोगी अपने को काफी दिनों तक सामान्य दिनचर्या के साथ जी सकता है। बताया जिले में पहले मरीजों का रिकार्ड नहीं रखा जाता था पर अब मरीजों से संपर्क स्थापित कर उन्हें टीबी की दवा दी जाती है।
एसीएमओ डाक्टर आरबी सिंह ने बताया कि उनके पास से डीपीओ का चार्ज था। उन्होंने दो सालों से लोगों में जागरूकता लाने के लिए वर्कशाप आयोजित किए जिनमें रुट लेबल पर काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों एएनएम, आशा बहू, स्टाफ नर्सेज को इसके बारे में जानकारी दी गई और ये कर्मचारी ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को जागरूक करने का काम करते हैं। डीपीओ डाक्टर रत्नाकर सिंह ने बताया कि सरकार टीबी व अखबारों के माध्यम से भी जागरूकता आती है लेकिन जब व्यक्ति दो-दो साल तक परिवार से बाहर रहता है तो कितना भी समझाएं वह इसका शिकार हो जाता है।

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