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ये महामहिम नेता हैं, नवयुग प्रणेता हैं..

Chitrakoot

Updated Mon, 17 Dec 2012 05:30 AM IST
चित्रकूट। जनकवि केदारनाथ स्मृति समारोह में देर शाम कवि गोष्ठी में कवियों ने अपनी एक-एक रचना सुनाकर लोगों को प्रगतिशील कविता का भान कराया। ज्यादातर कवियों के रात में ही लौटने के शेड्यूल की वजह से यह कार्यक्रम एक घंटे ही चला।
दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ ने किया। संचालन कर रहे बनारस के संजय श्रीवास्तव ने बताया भी कि लगभग 75 साल पहले उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने इस संघ की स्थापना की थी। उन्होंने ही परंपरागत नायकत्व की छवि को तोड़कर गरीब आदमी को अपनी रचनाओं में स्थान दिया। आज भी संघ मुंशीजी के ध्येय वाक्य- साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है, पर चल रहा है। गोष्ठी की अध्यक्षता प्रख्यात रचनाकार नरेश सक्सेना ने की। शुरुआत नरेश की रचना से ही हुई। उन्होंने पढ़ा- जिसके पास चली गई मेरी जमीन, उसी के पास मेरी बारिश चली गई / अगली फसल होते ही सब चुकता कर दूंगा, अब तो ये गुजारिश भी चली गई। बनारस के प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष मो. दानिश की रचना की कुछ पंक्तियां थीं, दूरतक कोई नहीं कोई नहीं ये अकेला मजार किसका है/देख खंजर से लिपट जाएगा, खून पर अख्तयार किसका है। उनकी इन पंक्तियों को भरपूर दाद मिली- रातरानी महक उठी, इतना सादा सा प्यार किसका है/तुम भी पूछो तो क्या, बताऊं मैं ये नशा ये खुमार किसका है। झांसी के मु. नईम को आज की परिस्थितियों और दिखावे की दुनिया से शिकायत थी- रस्मों सा मना रहे लोक त्योहार, चांद की तरह दूर है प्रेम व्यवहार। बबेरू के रामचंद्र सरस ने लोकतंत्र की बदलती व्याख्या को उकेरा... उन्हीं के पीछे दौड़ पड़ती है अंधी जाति की जमात/ चुनाव के पहले बन जाते हैं जो दानवीर कर्ण। बनारस से आए डा. आनंद प्रकाश तिवारी की नेता पर चुटकी मजेदार थी- ये महामहिम नेता हैं, नवयुग प्रणेता हैं, कलियुग के त्रेता हैं, जनता विजेता हैं... दीन हैं, अनाथ हैं, किंतु दीनानाथ हैं। बांदा के नरेंद्र पुण्डरीक की रचना में उनकी जिंदगी में विभिन्न रिश्तों में आईं महिलाओं पर केंद्रित थी- सबसे पहले मेरा साबका उन स्त्रियों से पड़ा...। फै जाबाद के डा. रघुवंश मणि की रचना-सबसे पहले में बनावटीपन पर प्रभावी चोट थी- सबसे पहले मेरा कोई नाम न था, मुझे बुलाने को नाम बाद में दिए गए। ...जो पहले था वह सब मेरा, बाद का सब कुछ तुम्हारा। नरेश सक्सेना ने दो रचनाएं सुनाईं- जिसमें से एक को उन्होंने शिशु कविता का नाम दिया। कविता में शिशु के माध्यम से वयस्क की समझ पर गहरी चोट थी- शिशु लोरी के शब्द नहीं, संगीत समझता है/ शब्द बाद में सीखेगा, अभी वो अर्थ समझता है। उनसे साथी कवियों ने उस चर्चित रचना चंबल की कुछ पंक्तियों को भी सुनाने का आग्रह किया, जिसका नाट्य मंचन पृथ्वी थियेटर में हो रहा है। उन्होंने बताया कि उनको यह लंबी कविता याद नहीं है हालांकि फिर उन्होंने इसकी कुछ लाइनें पढ़ीं- गंगा, यमुना, कृष्णा, कावेरी, सरयू और अलखनंदा होते हैं लड़कियों के नाम, चंबल नाम नहीं है किसी लड़की का। चंबल प्रतिशोध की नदी है...। कवियों में कर्वी के दिग्विजय सिंह की रचना ने युवाओं को प्रेरणा दी। युवा कवि संदीप श्रीवास्तव की... तो मैं भी आफीसर होता को भी सराहा गया। राघव चित्रकूटी ने भी रचनाएं पढ़ीं। विवेक मिश्र ने व्यवस्थाओं पर चुटीले कटाक्ष किए। संतोष भदौरिया ने आभार व्यक्त किया।
चित्रकूट इंटर कालेज के जिस सभागार में यह कार्यक्रम हो रहा था, वहीं पर दीवारों में उन महान विभूतियों के चित्र लगे हैं, जिन्होंने इस कालेज को मूर्तरूप देने में महान भूमिका निभाई। पर इनके फोटो फ्रेमों की स्थिति और लटकता देखकर ऐसा नहीं लगता कि अब कालेज को उनकी यादों की जरूरत भी है।
कवि गोष्ठी के दौरान संचालक ने समयावधि कम देख व्यवस्था दी कि हर कवि एक एक रचना ही पढ़ेगा पर एक कवि ने इस महत्वपूर्ण निर्देश की अवहेलना की तो अध्यक्ष को संचालक से इशारा भी करना पड़ा। हालांकि इस नियम का उल्लेख नरेश जी ने भी उस समय किया जब संचालक ने अंत में उनसे कविता का समापन करने के लिए काव्य पाठ करने का आग्रह किया। इस पर संचालक की टिप्पणी पर सभी की सहमति रही- आप हद तोड़ चुके हैं, बेहद हो चुके हैं।
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