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... पर कला के परखने वालों की कमी अखरी

Chitrakoot

Updated Wed, 12 Dec 2012 05:30 AM IST
चित्रकूट। यूनीक साइंस रिसर्च इंस्टीट्यूट के तत्वावधान में लगाई गई तीन दिवसीय राष्ट्रीय चित्रकला प्रदर्शनी में खास भीड़ नहीं होने से बड़े शहरों से आए कलाकार मायूस हुए। उनकी कला के परखने वालों की कमी रही, जो इन युवा कलाकारों को खटकी। प्रदर्शन में कोलकाता, उड़ीसा, भोपाल, मथुरा, आगरा, ग्वालियर, दिल्ली, बिहार, सहारनपुर और खैरगढ़ के कलाकारों ने भाग लिया। अखिल भारतीय समाजसेवा संस्थान के भारतजननी परिसर रानीपुर भट्ट में लगी प्रदर्शनी न कहीं शोरगुल रहा, न ही कोई भीड़भाड़।
पहली राष्ट्रीय चित्रकला प्रदर्शनी के प्रति लोगों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई दी। कलाकारों की पेंटिग्स देख कर उसकी तारीफ करने वालों का टोटा रहा। जिले के आला अफसर भी प्रदर्शनी को देखने नहीं पहुंचे। कार्यशाला में कृष्ण-राधा की पेंटिंग पर ब्रश से रंग भर रही सहारनपुर की सीमा कांबोज ने लोगों की इस उदासीनता को गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने कहा कि उनको इस तरह के आयोजनों में भाग लेना अच्छा लगता है और लोग धीरे-धीरे कला की तरफ उन्मुख होंगे, ये उन्हें उम्मीद है। वहीं विनय कुमार का कहना था कि कार्यशाला के आयोजन के बारे में सोचा गया था तो लोगों ने बड़ी बड़ी बातें की थीं, वादे किए थे पर हकीकत में कुछ नजर नहीं आया। यहां तक कि वे लोग हमारी कला को देखने तक नहीं आए। उनका पहला अनुभव अच्छा नहीं रहा। मुजफ्फरपुर (बिहार) की अनामिका का कहना था कि अभी भी लोग कला को करियर बनाने से झिझकते हैं। पूरे आयोजन में महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के कला शिक्षकों का बड़ा योगदान रहा। यहां के डा. प्रसन्न पाटकर ने भी अपनी पेंटिंग्स युवा कलाकारों के उत्साहवर्द्धन के लिए लगाई थीं। डा. पाटकर ने कहा कि इस तरह की कार्यशालाओं को अगर कालेजों और स्कूलों में लगाया जाए तो नई पीढ़ी को कला के प्रति आकर्षित किया जा सकता है। डा. प्रमिला सिंह ने कहा कि कला के प्रति जागरूक होने की जरूरत है। कला के क्षेत्र में भी बढ़िया करियर बनाया जा सकता है। डा. राकेश कुमार ने कहा कि कला की उपयोगिता हर जगह है। अगर हम गांव के कुम्हार को देखें तो वह अपने पेशे में कला को जोड़ दे तो उसको उसका बेहतर मूल्य मिल सकता है। अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान और इस आयोजन में कलाकारों की रहने खाने की व्यवस्था करने वाले गोपाल भाई ने कहा कि यह अच्छी बात है कि युवा पीढ़ी रचनाधर्मिता की तरफ झुक रही है।
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