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कमांडर को नक्सली संगठन को साधने में हो रही मुश्किल

Chandauli

Updated Mon, 10 Dec 2012 05:30 AM IST
चकिया। सोन गंगा विंध्याचल जोन के नवोदित झारखंडी जोनल कमांडर अजीत उरांव उर्फ चार्लीस को भाकपा माओवादी के संगठन को साधने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। बिहार तथा झारखंड में स्वयंभू एरिया कमांडर जातीय आधार पर गोलबंदी में मशगूल हैं। इससे उनमें टकराव की स्थिति बनती जा रही है, जो अस्सी के दशक की जातीय हिंसा की पुनरावृत्ति कर सकती है। वहीं जोनल चीफ के सामने पुलिस तथा सुरक्षा बलों के ह्यूमन इंटेलीजेंस को भेदना बड़ी चुनौती है।
तीन माह पूर्व भाकपा माओवादी के केंद्रीय कमान की बैठक के बाद झारखंडी कमांडर अजीत उरांव उर्फ चार्लीस को सोनगंगा विंध्याचल जोन का कमांडर नियुक्त कर उसे जोन में नक्सली विचारधारा के आधार पर संगठन को पुनर्जीवित कर सक्रिय करने की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के नौगढ़, विजयगढ़ तथा राजगढ़ यूनिटों के एरिया कमांडर तक की नियुक्ति जोनल चीफ नहीं कर पाया है। बिहार तथा झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों में नक्सलियों के कई गुट उभर आए हैं जो अपने को स्वयंभू एरिया कमांडर घोषित कर छोटी मोटी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। यही नहीं नक्सली गुट जातीय आधार पर भी बंटे हुए हैं। सीमावर्ती क्षेत्र में खरवार, कोल, चेरो, उरांव, माझी, मुंडा जातियों के एरिया कमांडर अपने अपने जातियों के कारकूनों के बल पर नक्सली संगठन में अपना वर्चस्व बढ़ाने की होड़ में हैं। इससे जारी प्रतिस्पर्धा से आपसी मन मुटाव बढ़ रही है। उक्त संगठनों के बीच हिंसक संघर्ष की आशंकाएं उठने लगी हैं। इससे पार पाना झारखंडी कमांडर के वश में नहीं दिख रहा है। बड़े नक्सली नेताओं के आत्म समर्पण या गिरफ्तारी से नक्सली संगठन की चूलें इस जोन में हिल चुकी हैं। उसकी भरपाई की सारी कोशिशें अब तक व्यर्थ नजर आ रही हैं। इसी तरह की स्थिति अस्सी के दशक में आई थी, जब जातीय हिंसा का तांडव लंबे समय तक चला था तथा नब्बे के दशक में भाकपा माले एमसीसी तथा पीडब्ल्यूजी के बीच नक्सली क्षेत्र पर कब्जे के लिए वर्षों तक खूनी जंग बिहार में चली थी। जानकार सूत्रों पर भरोसा करें तो गुटों मेें विभाजित नक्सली संगठनों के पास भाकपा माओवादी के ही हथियार हैं, जिनका नियंत्रण भी कमांडर खो चुके हैं। वहीं विकास तथा रोजगार के बल पर पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा पड़ोसी राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के द्वारा विकसित ह्यूमन इंटेलिजेंस को भेदना भी नक्सली संगठन की बड़ी चुनौती है।
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