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खेतों में बिखरेगी मालवीय बासमती की खुशबू

Chandauli

Updated Sun, 27 May 2012 12:00 PM IST
चंदौली। काशी हिंदू विश्वविद्यालय कृषि विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने अब तक की सबसे ज्यादा उत्पादन देने वाली बासमती धान की प्रजाति ‘मालवीय बासमती धान 10-09’ को विकसित किया है। इसकी खुशबू शीघ्र ही धान के कटोरे में बिखरेगी। केंद्र सरकार के प्रमाणीकरण के बाद वर्ष 2013 में किसानों के लिए यह प्रजाति उपलब्ध हो जाएगी।
गौरतलब है कि तकरीबन 12 वर्ष के सतत शोध परीक्षण के बाद बीएचयू के कृषि वैज्ञानिकों ने ‘मालवीय बासमती धान 10-09’ की एक ऐसी प्रजाति विकसित की है जो दूसरी बासमती की प्रजातियों की तुलना में ज्यादा उत्पादन देती है। प्रोफेसर हेमंत कुमार जायसवाल, प्रो. रवि प्रताप सिंह व प्रो. बीकेश्रीवास्तव की संयुक्त टीम द्वारा तैयार की गई इस नई प्रजाति को अखिल भारतीय समन्वित चावल सुधार परियोजना की राष्ट्रीय कार्यशाला वेराइटल आईडेंटीफिकेशन समिति द्वारा देश के उन सभी प्रदेशों के लिए संस्तुत किया गया है जहां बासमती धान की खेती होती है। वर्ष 2013 से केंद्र सरकार के नोटीफिकेशन के बाद इस धान की प्रजाति किसानों के लिए उपलब्ध हो सकेगी। यह विकसित प्रजाति 140 दिन में तैयार होती है और दूसरी बासमती प्रजातियों की प्रति हेक्टेयर पैदावार 35 से 45 कुतंल की तुलना में 55-60 कुतंल उपज देती है। इसकी हर बाली में 260 से 300 दाने होते है। परीक्षण की रिपोर्ट के आधार पर इसका पका चावल सुडोल, लंबा, सुगंधित व स्वादिष्ट पाया गया है। इसकी पत्तियों व तनों में झुलसा रोग की मार झेलने की क्षमता है। यह पूजा बासमती-1 की तुलना में 20 फीसदी और तरावड़ी की तुलना में 65 फीसदी अधिक उपज देने वाला साबित हुआ है। इस धान केप्रजाति की नर्सरी 20 जून तक डाल देने पर फायदेमंद होगी। जिसके कारण रोपाई के बाद इसमे 20 अक्तूबर तक बाली पड़ने लगती है। वैज्ञानिकों केअनुसार इस प्रजाति के लिए कंपोष्ट व गोबर खाद का प्रयोग ज्यादा लाभकारी है। इसके अधिक उत्पादन के लिए प्रति हेक्टेयर नाईट्रोजन 90 किलो, फासफोरस 50 किलो व पोटास 50 किलो की दर से यदि खेत में डाला जाय तो अधिक उत्पादन पाया जा सकता है। इस नई प्रजाति के बाजार में आ जाने से धान के कटोरे के उन किसानों के लिए एक अच्छा संकेत माना जा रहा है, जो महीन व बासमती प्रजाति केधान की खेती करने के शौकीन हैं।


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