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गांव से ही चलती थी बाबूजी की सरकार

ब्यूरो/अमर उजाला, बुलंदशहर

Updated Fri, 13 Jan 2017 11:40 PM IST
The government was moving from village Papa

राजनी‌तिPC: अमर उजाला

ऐसे भी नेता रहे हैं, जो सत्ता के शिखर पर पहुंचने के बावजूद जमीन से जुड़े रहे। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाने वाले और प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे बाबू बनारसी दास आजीवन जन्मभूमि से जुड़े रहे।

सादगी पसंद और असाधारण व्यक्तित्व के धनी बाबू बनारसी दास पांच बार विधायक, मंत्री, सांसद, मुख्यमंत्री, स्पीकर से लेकर राज्यसभा के सभापति के पद पर आसीन रहे। राजनीति के शीर्ष तक पहुंचे बाबूजी के जीवन पर कभी कोई दाग नहीं लगा।

बुलंदशहर से सटे गांव उटरावली में साधारण किसान रामजीलाल के घर आठ जुलाई 1912 को जन्मे बाबू बनारसी दास ने 10 वीं तक पढ़ाई की थी। अंग्रेजों की गुलामी से व्यथित बाबूजी बीच में ही पढ़ाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। वह अंहिसावादी सोच के व्यक्ति थे और अहिंसा के माध्यम से ही देश की आजादी चाहते थे।

बाबूजी ने 1930 में हुए असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। 1941 में बाबूजी ने जिले में सत्याग्रह शुरू कर दिया। 1942 में उनको भारत छोड़ो आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने पर अंग्रेजी हुकूमत ने जेल में डाल दिया था। इसके बाद वह राजनीति में आ गए। आजादी से पहले 1946 में बाबूजी अंतरिम विधानसभा के निर्विरोध सदस्य चुने गए।

आजादी के बाद मार्च 1952 में निर्वाचित पहली विधानसभा के सदस्य और सभा सचिव के पद पर रहे। 1962 में बाबूजी दूसरी बार विधानसभा पहुंचे। इस दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त के मंत्रिमंडल में उन्हें सूचना एवं संसदीय कार्य मंत्री बनाया गया।

1963 से 1967 तक वह तत्कालीन मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी के मंत्रिमंडल में सहकारिता, श्रम और संसदीय मंत्री रहे। 1967 में हुए विधानसभा चुनाव में उन्होंने रिकॉर्ड मतों से चुनाव जीता और सिंचाई, विद्युत, श्रम एवं संसदीय कार्य मंत्रालय का प्रभार उनको सौंपा गया। तीन अप्रैल 1972 से 28 जून 1977 तक वह राज्यसभा के सांसद रहे।

इस दौरान वह अस्थाई सभापति भी रहे। 1977 में वह फिर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होकर विधानसभा पहुंचे। इस दौरान वह विधानसभा के स्पीकर के पद पर आसीन हुए। 28 फरवरी 1979 को प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

1983 को हुए लोकसभा उपचुनाव में बाबू बनारसी दास जीतकर संसद पहुंच गए। तीन अगस्त 1985 को बाबूजी का देहवसान हो गया।बाबूजी का जन्म सवर्ण परिवार में हुआ था। आजादी की लड़ाई में कूदने के कारण बाबूजी की पढ़ाई बेशक 10 वीं तक रही, लेकिन उन्होंने शिक्षा के प्रसार के लिए काफी काम किया।

बाबूजी का मानना था कि शिक्षा के माध्यम से ही सामाजिक विषमताओं को दूर किया जा सकता है।

उटरावली होता था केंद्र
बाबूजी का अपनी मातृभूमि से खासा लगाव था। वह विधायक से लेकर मुख्यमंत्री तक बने, लेकिन उन्होंने कभी अपनी मातृभूमि को नहीं भूला। वह मंत्री, मुख्यमंत्री काल में गांव में ही चौपाल लगाकर समस्याएं सुनकर उन्हें दूर कर देते थे। लोग बाबूजी के पास अपनी समस्या लेकर लखनऊ नहीं बल्कि उटरावली ही पहुंच जाते थे।

आज भी उटरावली गांव का रिकॉर्ड है कि वहां हर घर में एक सरकारी कर्मचारी था।

 
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